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भानु प्रताप शाही केस: हाईकोर्ट ने निचली अदालत से मांगा रिकॉर्ड, बरी करने के फैसले को सरकार ने दी चुनौती

भानु प्रताप शाही केस: हाईकोर्ट ने निचली अदालत से मांगा रिकॉर्ड, बरी करने के फैसले को सरकार ने दी चुनौती

रांची, (राणा प्रताप की रिपोर्ट): झारखंड हाईकोर्ट में गढ़वा के भवनाथपुर से जुड़े बहुचर्चित एससी-एसटी एक्ट मामले में पूर्व मंत्री और वर्तमान विधायक भानु प्रताप शाही को बरी किए जाने के खिलाफ सुनवाई हुई. राज्य सरकार द्वारा दायर ‘एक्विट्टल अपील’ पर जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं. सुनवाई के बाद कोर्ट ने इस मामले में पलामू की निचली अदालत से ‘लोअर कोर्ट रिकॉर्ड’ (LCR) प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है. इस रिकॉर्ड के प्राप्त होने के बाद ही मामले की गहराई से समीक्षा की जाएगी और आगे की सुनवाई शुरू होगी.

सरकार ने दी है निचली अदालत के फैसले को चुनौती

गौरतलब है कि पलामू की एमपी-एमएलए विशेष अदालत ने साक्ष्य के अभाव में भानु प्रताप शाही को इस मामले में बरी कर दिया था. हालांकि, इसी मामले में संलिप्त अन्य चार आरोपियों को अदालत ने छह महीने की सजा सुनाई थी. राज्य सरकार ने विशेष अदालत के इसी फैसले पर असहमति जताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. सरकार का तर्क है कि मामले में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं, जिनकी समीक्षा उच्च न्यायालय स्तर पर की जानी चाहिए.

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2006 का विवाद: डॉक्टर से अभद्रता का आरोप

यह कानूनी विवाद साल 2006 का है, जब भवनाथपुर सेल में कार्यरत चिकित्सक डॉ. विजय कुमार ने तत्कालीन विधायक भानु प्रताप शाही और उनके समर्थकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी. आरोप के अनुसार, क्वार्टर आवंटन को लेकर विधायक और चिकित्सक के बीच तीखा विवाद हुआ था. डॉ. विजय कुमार ने आरोप लगाया था कि विधायक ने उनके साथ न केवल अभद्र व्यवहार किया, बल्कि जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें अपमानित किया. साथ ही, उनके क्वार्टर से सामान बाहर फेंकने की बात भी प्राथमिकी में कही गई थी.

राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज

करीब 18 साल पुराने इस मामले के हाईकोर्ट में दोबारा सक्रिय होने से राजनीतिक और कानूनी गलियारों में सरगर्मी बढ़ गई है. लोअर कोर्ट रिकॉर्ड पेश होने के बाद होने वाली अगली सुनवाई भानु प्रताप शाही के राजनीतिक भविष्य और इस कानूनी लड़ाई की दिशा तय करेगी. फिलहाल, विधायक और सरकार दोनों ही पक्षों की नजरें हाईकोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं.

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