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मधुबनी जिले में कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध अभिकरण (आत्मा) और कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा संतुलित उर्वरक उपयोग को लेकर एक विशेष जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। यह अभियान खरीफ मौसम के दौरान पंचायत से लेकर प्रखंड स्तर तक संचालित किया जा रहा है। इसमें कृषि विभाग के अधिकारी और कर्मचारी किसानों को उर्वरकों के वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग के प्रति जागरूक कर रहे हैं। जिला कृषि पदाधिकारी-सह-परियोजना निदेशक, आत्मा मधुबनी, ललन कुमार चौधरी ने गुरुवार को बताया कि किसानों द्वारा उर्वरकों के असंतुलित और अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की उपज क्षमता लगातार प्रभावित हो रही है। इसके अतिरिक्त, उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। भारत सरकार के निर्देशों के तहत, जिलेभर में किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को बताया जा रहा है कि संतुलित उर्वरक उपयोग का अर्थ केवल रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नहीं है। इसका मतलब है कि फसलों की आवश्यकता, मिट्टी की उर्वरता की स्थिति और मौजूदा जलवायु परिस्थितियों के आधार पर सभी आवश्यक पोषक तत्वों का उचित अनुपात, उचित मात्रा, उचित समय और उचित विधि से उपयोग किया जाए। जिला कृषि पदाधिकारी ने स्पष्ट किया कि संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करने से फसल उत्पादकता में वृद्धि होती है। इससे उच्च उपज देने वाली किस्मों का प्रदर्शन बेहतर होता है। साथ ही, पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार, फसल की गुणवत्ता में वृद्धि और फसलों की तनाव सहनशीलता में भी सहायता मिलती है, जिससे मृदा स्वास्थ्य की स्थिरता बनी रहती है। उन्होंने आगे कहा कि संतुलित उर्वरक उपयोग से पर्यावरणीय जोखिम कम होते हैं और किसानों की लागत भी घटती है, जिससे इनपुट का उपयोग अधिक प्रभावी होता है। कृषि विभाग ने सभी किसानों से अपील की है कि वे वैज्ञानिक पद्धति अपनाते हुए संतुलित और न्यायोचित उर्वरक उपयोग को अपनी खेती का हिस्सा बनाएं, ताकि टिकाऊ और लाभकारी कृषि व्यवस्था को बढ़ावा मिल सके।


