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देशभर में नवरात्र धूमधाम से मनाया जा रहा है। दुर्गा पूजा के छठे दिन कोडरमा जिले के मरकच्चो प्रखंड से करीब 25 किलोमीटर दूर मां चंचालिनी धाम में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। यह धाम बंदरचौकवा की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 551 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस धाम का इतिहास करीब 200 साल पुराना है। स्थानीय पुजारियों के अनुसार, इसकी स्थापना देवीपुर के राजघराने से जुड़ी है। लोकमान्यता है कि मां चंचालिनी ने राजा को सपने में दर्शन देकर यहां पूजा शुरू करने का आदेश दिया था। धाम में कुछ अनोखी परंपराएं हैं। पुजारी पवन पांडेय के मुताबिक, यहां मां को कुंवारी कन्या के रूप में पूजा जाता है। इसलिए महिलाओं को सिंदूर लगाकर पूजा करना मना है। देवीपुर राजघराने की बेटियों की संतानों का पहला मुंडन संस्कार भी इसी धाम में होता था। मन्नत और दिव्य संकेत की मान्यता
भक्तों की मनोकामना पूर्ति से जुड़ी यहां एक अत्यंत रोचक परंपरा है। श्रद्धालु मां के मस्तक पर बेलपत्र, अक्षत और फूल अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि अर्पित सामग्री अपने आप नीचे गिर जाती है, तो इसे माता की स्वीकृति और मन्नत पूरी होने का दिव्य संकेत माना जाता है। इसके अलावा, नवरात्र में कई श्रद्धालु निर्जला या फलाहार व्रत रखकर मां के दरबार में साधना करते हैं। मान्यता के अनुसार, माता स्वप्न में आकर मन्नत पूर्ण होने का संकेत देती हैं, जिसके बाद ही भक्त अपना संकल्प खोलते हैं। श्रद्धालुओं के सहयोग से विकास
चंचालिनी धाम विकास समिति के अध्यक्ष नूनमन सिंह ने बताया कि भक्तों और स्थानीय समुदाय के सहयोग से आज यह धाम निरंतर विकसित हो रहा है। यहां आने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए धर्मशालाएं, विवाह मंडप और यज्ञ मंडप का निर्माण कराया गया है। 551 सीढ़ियों का यह सफर वास्तव में शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि आत्मा और ईश्वर के जुड़ाव का मार्ग है। लोकआस्था, विशिष्ट परंपराओं और प्राकृतिक शांति से समृद्ध मां चंचालिनी धाम आज भी हर भक्त के जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करता है।
मां चंचालिनी धाम में उमड़ी भक्तों की भीड़:551 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं श्रद्धालु, 200 साल पुरानी है आस्था और अनोखी परंपराएं
