
Kishanganj Military Station Controversy: देश की सीमाओं की सुरक्षा और सुरक्षा की नज़र से बेहद संवेदनशील ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (चिकन नेक) के निकट किशनगंज जिले के ठाकुरगंज में एक बड़ा जमीनी खेल सामने आया है.
भारतीय सेना के एक नए सैन्य स्टेशन की योजना चल रही है. लेकिन, इस बीच, चुनी हुई ज़मीन के मालिक बहुत ही अजीब तरह से और तेज़ी से बदले हैं.
सरकारी अभिलेखों और खरीद-बिक्री के कागज़ (सेल डीड) की पड़ताल से खुलासा हुआ है कि प्रस्तावित क्षेत्र की लगभग 70 एकड़ 91 डिसमिल भूमि महज 7 बाहरी खरीदारों के नाम पंजीकृत करा दी गई है.
क्यों खास है यह जमीन?
ठाकुरगंज प्रखंड का मौजा भेलागुड़ी भौगोलिक और सुरक्षा की नज़र से बेहद खास स्थिति में है:
- चिकन नेक के करीब: यह इलाका भारत के मुख्य भू-भाग को पूर्वोत्तर राज्यों (North East) से जोड़ने वाले एकमात्र संकरे रास्ते ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ के बिल्कुल पास है.
- तीन देशों की सीमाएं: नेपाल, बांग्लादेश और भूटान की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के नजदीक होने के कारण यह क्षेत्र सैन्य दृष्टिकोण से अति-संवेदनशील है. इसी वजह से रक्षा संपदा विभाग और जिला प्रशासन ने यहां सेना के नए स्टेशन के लिए 189.68 एकड़ निजी भूमि लेने के लिए फाइल आगे बढ़ाई थी.
सरकारी प्रक्रिया धीमी, रजिस्ट्रियों की तेज रफ्तार
उपलब्ध आधिकारिक और रजिस्ट्री दस्तावेजों के अनुसार, सैन्य स्टेशन की प्रशासनिक प्रक्रिया और निजी खरीद की समयरेखा (Timeline) एक-दूसरे के बेहद करीब दिखती है:
- 01 अक्टूबर 2025: सैन्य स्टेशन की स्थापना के लिए प्रारंभिक सरकारी कार्रवाई और बातचीत/लिखत-पढ़त शुरू हुई.
- 07 नवंबर 2025: प्रशासनिक स्तर पर चिन्हित भूमि का मिलकर ज़मीन का मुआयना (Joint Survey) प्रारंभ किया गया.
- 21 जनवरी व 10 फरवरी 2026: जिला प्रशासन और भू-अर्जन कार्यालय द्वारा भूमि अधिग्रहण को लेकर अंतिम चरण का बातचीत/लिखत-पढ़त हुआ.
- 11 फरवरी 2026 से शुरुआत: ठीक इसी के अगले दिन यानी 11 फरवरी से उस क्षेत्र में जमीनों की ताबड़तोड़ रजिस्ट्रियां होनी शुरू हो गईं. हद तो तब हो गई जब 28 मार्च 2026 को एक ही दिन में कई बड़े भूमि सौदों का पंजीकरण करा लिया गया.
दिल्ली और यूपी का कनेक्शन: किसने कितनी जमीन खरीदी?
हैरानी की बात यह है कि इन सभी 15 खरीद-बिक्री के कागज़ में किसी भी खरीदार का स्थायी पता किशनगंज जिले या बिहार का नहीं है. सभी खरीदार उत्तर प्रदेश और देश की राजधानी दिल्ली के रहने वाले हैं:
| खरीदार का नाम | दर्ज स्थायी पता | खरीदी गई कुल भूमि |
| मोहम्मद सलमान खान | 24-F, सेक्टर-7, जसोला विहार, दक्षिण दिल्ली | 14.09 एकड़ |
| मोहम्मद सुल्तान | चमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) | 13.93 एकड़ |
| सुलेमान खान | चमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) | 13.12 एकड़ |
| मोहम्मद शमीम | जसोला, दक्षिण दिल्ली | 11.72 एकड़ |
| मोहम्मद अनस | मऊ (उत्तर प्रदेश) | 9.05 एकड़ |
| तश्कील अहमद | चमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) | 7.35 एकड़ |
| इमरान प्रतापगढ़ी | चमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) | 1.61 एकड़ |
सरकारी दस्तावेजों में एक ऐसा नाम सामने आया जिसने सबको चौंका दिया: ‘पार्लियामेंट मेंबर’!
इस पूरे मामले ने तब राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ ले लिया जब रजिस्ट्री के कुछ खास विलेखों (संख्या 1418, 1420 और 1426) की जांच की गई.
- इन दस्तावेजों में खरीदार के रूप में इमरान प्रतापगढ़ी, पिता-मोहम्मद इलियास खान, निवासी ग्राम- चमरूपुर शुकुलान, जिला- प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है.
- सबसे खास बात यह है कि विलेख के ‘पेशा’ (Profession) वाले कॉलम में साफ तौर पर “खेती वगैरह एवं पार्लियामेंट मेंबर” लिखा हुआ है.
- राज्यसभा की आधिकारिक सदस्य निर्देशिका (Official Directory) के अनुसार भी कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी का स्थायी पता यही दर्ज है. हालांकि, दोनों के एक ही व्यक्ति होने की 100% आधिकारिक पुष्टि के लिए प्रशासनिक स्तर पर स्वतंत्र जांच की दरकार है.
Kishanganj Military Station Controversy: क्या इस मामले में गोपनीय सूचनाओं के लीक होने की आशंका है? उठ रहे कई प्रश्न
जमीन खरीदना किसी भी नागरिक का वैध कानूनी अधिकार है, लेकिन जब मामला देश की सुरक्षा और सैन्य स्टेशन से जुड़ा हो, तो इस पूरी क्रोनोलॉजी पर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं:
- क्या विभागों को भनक थी?: क्या रक्षा संपदा विभाग, निबंधन कार्यालय और जिला प्रशासन को इस बात की जानकारी थी कि जिस जमीन को सेना के लिए लेने के लिए ज़मीन का मामला चल रहा है, उसे बाहरी लोग धड़ल्ले से खरीद रहे हैं?
- समीक्षा क्यों नहीं हुई?: क्या अधिग्रहण प्रक्रिया के दौरान निबंधन (रजिस्ट्री) पर रोक लगाने अथवा इसकी उच्च स्तरीय समीक्षा करने का प्रयास किया गया?
- मुआवजे का खेल?: अगर यह 70.91 एकड़ ज़मीन सेना के लिए अधिग्रहित होने वाली 189.68 एकड़ ज़मीन का हिस्सा है, तो ज़ाहिर है करोड़ों रुपये का मुआवज़ा दिया जाएगा. ऐसे में सवाल उठता है कि इस भारी भरकम मुआवज़े का असली हक़दार कौन होगा?
इन सवालों के जवाब आम जनता के लिए फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं, और सीमांचल जैसे संवेदनशील इलाके में हुई इन ज़मीन की खरीद-फरोख्त की गहराई से जांच की ज़रूरत है.


