Balagudar Archaeological Site: लखीसराय के बालगुदर टीले की मिट्टी से एक बार फिर इतिहास का अहम सुराग मिला है. एनएच-80 पर अशोक धाम मोड़ के पास स्थित राज्य संरक्षित पुरातात्विक स्थल से भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में एक खंडित प्रतिमा मिली है. संग्रहालय के अधिकारियों के अनुसार, यह प्रतिमा 11वीं से 12वीं शताब्दी की है.
खास बात यह रही कि प्रतिमा मिलने के बाद स्थानीय बच्चों ने उसे अपने पास रखने के बजाय संग्रहालय को सौंप दिया. दूसरी ओर, स्थल पर मिट्टी कटाव और संरक्षण की कमी के बीच पुरातात्विक धरोहर की सुरक्षा का सवाल भी फिर सामने आया है. मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार ने चहारदीवारी का निर्माण शीघ्र पूरा कराने और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने का निर्देश दिया है.
बच्चों ने दिखाई जागरूकता, प्रतिमा को पहुंचाया संग्रहालय
बालगुदर टीले पर मिट्टी की कटाई के दौरान बच्चों को भगवान बुद्ध की खंडित प्रतिमा मिली. पुरातात्विक महत्व की इस कलाकृति को अपने पास रखने के बजाय बच्चों ने लखीसराय संग्रहालय को सौंप दिया. उनकी इस पहल की सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. दिलीप कुमार ने सराहना की.
ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में स्थानीय लोगों की जागरूकता अहम भूमिका निभाती है. जमीन के भीतर या मिट्टी में दबे पुरावशेष सामने आने पर उन्हें सुरक्षित रखना और संबंधित विभाग को सूचना देना जरूरी होता है. बालगुदर में बच्चों की पहल ने इस जिम्मेदारी की एक अच्छी मिसाल पेश की है.
11वीं से 12वीं शताब्दी की है प्रतिमा, भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध
लखीसराय संग्रहालय के सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. दिलीप कुमार और वरीय तकनीकी सहायक राजेश कुमार ने प्रतिमा का निरीक्षण कर इसे 11वीं से 12वीं शताब्दी का बताया. प्रतिमा भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में है. इसका आकार 30.3 सेंटीमीटर लंबा, 10.2 सेंटीमीटर चौड़ा और 7.5 सेंटीमीटर मोटा बताया गया है.
भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध का एक हाथ धरती की ओर होता है. बौद्ध परंपरा में इस मुद्रा को बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है. बालगुदर से ऐसी प्रतिमा मिलना इस क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण है.
बिहार विरासत विकास समिति के कार्यपालक निदेशक प्रो. अनिल कुमार ने प्रतिमा को आठवां बोधिसत्व बताया है. उनके अनुसार, यह रत्नजटित यानी आभूषणों और रत्नों से सुसज्जित कलाकृति है. प्रतिमा की ऐतिहासिक पहचान और विशेषताओं के विस्तृत अध्ययन से इसके महत्व को और स्पष्ट किया जा सकेगा.
सूचना मिलते ही संग्रहालय की टीम ने किया स्थल निरीक्षण
प्रतिमा मिलने की जानकारी के बाद संग्रहालय की टीम बालगुदर टीले पर पहुंची और स्थल की स्थिति का जायजा लिया. निरीक्षण दल में सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. दिलीप कुमार, वरीय तकनीकी सहायक राजेश कुमार, मोहम्मद सादिक आलम और चंचल कुमार शामिल थे. गृह रक्षा वाहिनी के जवान प्रमोद यादव और सुधीर कुमार भी टीम के साथ मौजूद थे.
स्थल निरीक्षण के दौरान टीले पर मिट्टी कटाव और संरक्षण से जुड़ी स्थिति का महत्व फिर सामने आया. तस्वीरों में पुरातात्विक स्थल पर मिट्टी कटने और कुछ जगहों पर ग्रामीणों द्वारा गोबर के उपले रखे जाने की स्थिति दिखाई गई है. ऐसे हालात में पुरास्थल की सीमा तय करना, अनधिकृत गतिविधियों पर रोक लगाना और ऐतिहासिक अवशेषों को सुरक्षित रखना जरूरी हो जाता है.
अधूरी चहारदीवारी से बढ़ी चिंता, पहले भी भेजा गया था पत्र
बालगुदर टीला राज्य संरक्षित पुरातात्विक स्थल है. इसके संरक्षण और अवैध छेड़छाड़ को रोकने के लिए चहारदीवारी का निर्माण कराया जा रहा है, लेकिन काम पूरा नहीं होने को लेकर चिंता जताई गई है.
बिहार विरासत विकास समिति, कला एवं संस्कृति विभाग, पटना के कार्यपालक निदेशक प्रो. अनिल कुमार ने लखीसराय के जिलाधिकारी को भेजे पत्र में स्थल की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था. पत्रांक 312, दिनांक 22 अक्टूबर 2026 के माध्यम से बताया गया था कि अधूरा निर्माण होने के कारण पुरास्थल के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की शिकायतें मिल रही हैं.
ऐतिहासिक स्थल पर मिट्टी कटाई और दूसरे अनधिकृत हस्तक्षेप से पुरावशेषों को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है. ऐसे में केवल प्रतिमा मिलने के बाद उसे संग्रहालय तक पहुंचाना पर्याप्त नहीं है. जिस स्थान से वह मिली है, वहां की मिट्टी, संरचनाओं और अन्य संभावित पुरावशेषों को भी सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है.
डीएम ने चहारदीवारी का काम जल्द पूरा कराने का दिया निर्देश
बालगुदर पुरास्थल की सुरक्षा को लेकर जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार ने 22 अक्टूबर 2026 को अनुमंडलाधिकारी और अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी को पत्र जारी किया. उन्होंने अधूरे निर्माण कार्य को गंभीर विषय बताते हुए संबंधित विभाग और कार्य एजेंसी से समन्वय कर चहारदीवारी का काम प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र पूरा कराने का निर्देश दिया.
डीएम ने पुरास्थल की सुरक्षा के लिए कानून के तहत निरोधात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने को भी कहा है, ताकि किसी तरह की अवैध गतिविधि न हो सके. बालगुदर को बिहार प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल, अवशेष एवं कला धरोहर अधिनियम, 1976 के तहत राज्य संरक्षित पुरास्थल घोषित किया गया है.
अब प्रशासन के सामने दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं. पहली, चहारदीवारी का निर्माण समय पर पूरा कराकर स्थल को सुरक्षित करना. दूसरी, पुरातात्विक महत्व वाले क्षेत्र में मिट्टी कटाई और छेड़छाड़ पर प्रभावी रोक लगाना. नई प्रतिमा मिलने के बाद यह देखना अहम होगा कि संरक्षण के निर्देशों पर कितनी तेजी से अमल होता है.
Balagudar Archaeological Site: बालगुदर की विरासत बचाने के लिए जरूरी है ठोस संरक्षण
बालगुदर टीले से मिली खंडित प्रतिमा सिर्फ एक पुरानी कलाकृति नहीं, बल्कि लखीसराय के अतीत को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. ऐसे पुरास्थलों की वैज्ञानिक जांच और व्यवस्थित सुरक्षा से इतिहास से जुड़े नए तथ्य सामने आ सकते हैं. इसके उलट, मिट्टी कटाव और अनियंत्रित गतिविधियों से महत्वपूर्ण साक्ष्य हमेशा के लिए नष्ट हो सकते हैं.
स्थानीय बच्चों की जागरूकता ने प्रतिमा को सुरक्षित संग्रहालय तक पहुंचाने में मदद की है. अब स्थल की सुरक्षा सुनिश्चित करना संबंधित विभागों और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है. चहारदीवारी का निर्माण पूरा होने, निगरानी मजबूत होने और पुरावशेषों के व्यवस्थित अध्ययन से ही बालगुदर की ऐतिहासिक विरासत को लंबे समय तक बचाया जा सकता है.



Also Read: पप्पू यादव की बिगड़ी तबीयत, अचानक आने लगा चक्कर, गिरते-गिरते बचे सांसद
The post लखीसराय के बालगुदर टीले से मिली 11वीं-12वीं शताब्दी की बुद्ध प्रतिमा, संरक्षण पर डीएम सख्त appeared first on Prabhat Khabar.
