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लीची उत्पादन के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध मुजफ्फरपुर से एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि सामने आई है। बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के पूर्व डीन (विज्ञान संकाय) और कीट वैज्ञानिक प्रो. मनेन्द्र कुमार की ओर से विकसित ‘मल्टी-लेयर टार्गेटेड बायो पेस्टिसाइड सिस्टम फॉर सस्टेनेबल लीची पेस्ट मैनेजमेंट’ को भारत सरकार ने पेटेंट के रूप में प्रकाशित किया है। अगर ये आविष्कार आसानी से लीची किसानों को उपलब्ध कराया जाए तो यह फसल के लिए गेम चेंजर बन सकता है। प्रो. मनेंद्र ने इस मशीन के बारे में बताया कि, यह अत्याधुनिक तकनीक लीची बागानों में कीट प्रबंधन की जटिल समस्याओं का समाधान है। खास बात यह है कि यह पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल, टिकाऊ और दीर्घकालिक प्रभाव देने वाली प्रणाली है। रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर हैं किसान वर्तमान में किसान कीट नियंत्रण के लिए रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर रहते हैं, जिससे लागत बढ़ती है और पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में यह नई तकनीक एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प बनकर उभरी है। इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह ‘स्प्रे-रहित तकनीक’ पर आधारित है। यानी इसमें किसी तरह के कीटनाशक छिड़काव की जरूरत नहीं होती। डिवाइस को पेड़ों पर लटकाया जा सकता है, शाखाओं पर क्लिप के रूप में लगाया जा सकता है या जड़ों के पास स्थापित किया जा सकता है। इसकी डिजाइन इस प्रकार तैयार की गई है कि यह धीरे-धीरे लक्षित तरीके से कीटों को नियंत्रित करता है, जिससे प्रभावी परिणाम मिलते हैं। तकनीक की मजबूती भी इसकी बड़ी विशेषता है। डिवाइस को इस तरह विकसित किया गया है कि यह अल्ट्रावॉयलेट (यूवी) किरणों, बारिश और अन्य पर्यावरणीय प्रभावों से सुरक्षित रहता है। यानी एक बार लगाने के बाद यह लंबे समय तक काम करता है, जिससे किसानों को बार-बार खर्च नहीं करना पड़ता। बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन हो तो 150-200 रुपए होगी कीमत आर्थिक रूप से भी यह तकनीक किसानों के लिए फायदेमंद है। बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर एक डिवाइस की लागत लगभग 150 से 200 रुपए के बीच होगी। एक एकड़ लीची बागान में करीब 25 से 30 डिवाइस की जरूरत होगी, जिससे कुल खर्च लगभग 5 हजार रुपए के आसपास आएगा। पारंपरिक कीटनाशकों की तुलना में यह अधिक किफायती और टिकाऊ विकल्प है। प्रो. मनेंद्र ने बताया कि, इस तकनीक से न सिर्फ कीट नियंत्रण बेहतर होगा, बल्कि लीची की पैदावार और गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। इससे किसानों की आय बढ़ने की संभावना है। मुजफ्फरपुर जैसे क्षेत्र, जहां लीची उत्पादन किसानों की आजीविका का प्रमुख साधन है, वहां यह तकनीक बड़ा बदलाव ला सकती है। रासायनिक उपयोग में कमी आएगी प्रो. मनेंद्र ने बताया कि यह आविष्कार ‘सस्टेनेबल एग्रीकल्चर’ यानी टिकाऊ कृषि की दिशा में एक अहम कदम है। इससे रासायनिक उपयोग में कमी आएगी, मिट्टी और जल की गुणवत्ता बेहतर बनी रहेगी और पर्यावरण संतुलन को भी बढ़ावा मिलेगा। स्थानीय किसान गोपाल चौधरी ने बताया कि सरकार इसे अगर बड़े स्तर पर लागू करने की दिशा में पहल करेगी। यदि इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाया गया, तो मुजफ्फरपुर की लीची उत्पादन और गुणवत्ता दोनों के मामले में वैश्विक स्तर पर नई पहचान बना सकती है।


