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जमुई में श्रावण मास की पहली सोमवारी पर जिले के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। पतनेश्वर धाम में तड़के तीन बजे से ही शिवभक्त जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचने लगे। ‘हर-हर महादेव’ और ‘बोल बम’ के जयघोष से पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठा। किऊल नदी के तट पर पहाड़ी की चोटी पर स्थित बाबा पतनेश्वर धाम जिले के प्रमुख शिव मंदिरों में से एक है। यह मंदिर अपनी प्राचीन मान्यताओं और ऐतिहासिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। मान्यता है कि वर्ष 1171 ईस्वी में घने जंगल के बीच पहाड़ी पर स्वयंभू शिवलिंग मिलने के बाद इस स्थान की पहचान बनी। तब से आज तक यहां श्रद्धालुओं की आस्था कायम है। लकड़ी चुनने के दौरान पहाड़ी पर शिवलिंग दिखा सावन महीने में भक्त पहले किऊल नदी में स्नान करते हैं। इसके बाद वे 104 सीढ़ियां चढ़कर मंदिर पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। श्रद्धालु परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी राजीव कुमार पांडेय के अनुसार, वर्ष 1171 में खैरमा गांव के गोस्वामी परिवार के एक व्यक्ति को जंगल में लकड़ी चुनने के दौरान पहाड़ी पर शिवलिंग दिखाई दिया था। इसकी जानकारी खैरा रियासत के तत्कालीन शासक महादेवा राजा तक पहुंची। उन्होंने यहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना शुरू कराई, जिसके बाद यह स्थान राजपरिवार से निकलकर आम लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया। मान्यताएं धार्मिक आस्था पर आधारित मंदिर परिसर में भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय, मां दुर्गा, भगवान राम, लक्ष्मण, सीता, बजरंगबली, काल भैरव और नंदी की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। श्रद्धालु यहां सभी देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां जलाभिषेक करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और रोगों से मुक्ति मिलती है। ये मान्यताएं धार्मिक आस्था पर आधारित हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, कई जनप्रतिनिधि और राजनीतिक हस्तियां भी समय-समय पर बाबा पतनेश्वर धाम में पूजा-अर्चना कर चुकी हैं। सावन के पूरे महीने मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बनी रहती है।

