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सात जन्मों का रिश्ता टूटने को तैयार, पति बोला- अब किसी और के साथ रहूंगा, बच्चों के बीच जिंदगी के लिए जूझती रितु

सात जन्मों का रिश्ता टूटने को तैयार, पति बोला- अब किसी और के साथ रहूंगा, बच्चों के बीच जिंदगी के लिए जूझती रितु

‘एक-एक पल तिल-तिल कर मर रही हूं… बार-बार आत्महत्या का ख्याल आता है, लेकिन बच्चों का चेहरा सामने आ जाता है. शरीर पूरी तरह लाश बन चुका है, बस सांसें चल रही हैं.’ रितु (बदला हुआ नाम) के मुंह से ये शब्द निकलते हैं और अचानक उसकी आवाज भर्रा जाती है. होंठ कांपने लगते हैं. चेहरा लाल पड़ जाता है. आंखों में जमा आंसू छलक पड़ते हैं. कुछ पल तक वह होंठ दबाये गुमसुम बैठी रहती है. जैसे भीतर उमड़ते दर्द के समंदर को किसी तरह रोक रही हो. फिर एक लंबी सांस लेकर कहती है-‘उन्होंने मुझसे साफ कह दिया है कि वह मेरे साथ नहीं रहना चाहते. उनका ऑफिस की एक महिला कर्मी से अफेयर है. वह उसके साथ लिव-इन में रहने के लिए भी तैयार हैं.’ रितु के लिए यह सिर्फ पति का किसी दूसरी महिला के करीब जाना नहीं है. यह उसकी पूरी जिंदगी की मान्यताओं का अचानक ढह जाना है. 

भागलपुर के एक मध्यवर्गीय परिवार से आने वाली रितु उस पारिवारिक संस्कार में पली-बढ़ी है, जहां विवाह सिर्फ दो लोगों का साथ नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो जिंदगियों का आजीवन बंधन माना जाता है. जहां पत्नी पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है. जहां सात फेरों के साथ लिये गये वचन को सात जन्मों का रिश्ता माना जाता है. रितु ने भी इसी विश्वास के साथ अपना घर बसाया था. लेकिन अब उसी घर में उसके सामने एक ऐसा सवाल खड़ा है, जिसका कोई जवाब उसके संस्कारों के पास नहीं है. अगर पति ही कह दे कि वह किसी और के साथ रहना चाहता है, तो पत्नी अपने उस रिश्ते को बचाये कैसे, जिसे वह जीवन भर का बंधन मानती रही?

एक तरफ सात फेरे, दूसरी तरफ लिव-इन का फैसला

रितु और उसके पति की मुलाकात नौकरी के दौरान हुई थी. दोनों एक-दूसरे के करीब आये. प्रेम हुआ. शादी का फैसला लिया. परिवारों ने भी रिश्ते को स्वीकार कर लिया. दिल्ली स्थित सर सीवी रमन इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से आइटी प्रोफेशनल का कोर्स करने के बाद रितु ने बेंगलुरु में नौकरी शुरू की थी. जिंदगी पटरी पर थी. करियर था, प्रेम था, शादी थी और फिर बच्चे हुए. उसे लगा था कि जिंदगी ने उसे वह सब दे दिया है, जिसका उसने सपना देखा था. लेकिन करीब आठ महीने पहले सब कुछ बदलने लगा. पति के व्यवहार में बदलाव आया. बातचीत कम हुई. दूरी बढ़ने लगी. फिर रितु को पता चला कि पति के ऑफिस की एक महिला कर्मी के साथ संबंध हैं. रितु बताती है कि यह रिश्ता अब सिर्फ मुलाकातों और बातचीत तक सीमित नहीं है. उसके पति ने उससे बेझिझक कहा है कि वह उस महिला के साथ लिव-इन में रहना चाहते हैं और रितु के साथ अपना रिश्ता खत्म करना चाहते हैं. जिस आदमी के साथ रितु ने जिंदगी भर साथ निभाने की कसमें खायी थीं, वही अब उसे अपनी जिंदगी से बाहर करने की बात कर रहा है. यही वह बिंदु है, जहां रितु का दर्द सिर्फ निजी नहीं रह जाता. यह बदलते रिश्तों और बदलते सामाजिक मानस का सवाल बन जाता है.

‘मैंने तो सात जन्मों के लिए साथ माना था…’

रितु की पीड़ा को समझने के लिए उसके सामाजिक और पारिवारिक परिवेश को समझना जरूरी है. भागलपुर के मध्यवर्गीय परिवार से निकली रितु के लिए विवाह कोई अस्थायी समझौता नहीं था. उसने विवाह को उस रिश्ते की तरह देखा, जिसमें सुख-दुख में साथ रहना है. पति के साथ जीवन की हर मुश्किल का सामना करना है. बच्चों को पालना है. परिवार को संभालना है. उसके लिए पति का साथ छूटना सिर्फ एक रिश्ते का टूटना नहीं है. यह उसके जीवन की उस पूरी परिभाषा का टूटना है, जिस पर उसने भरोसा किया था. और शायद इसीलिए वह कहती है- ‘एक-एक पल तिल-तिल कर मर रही हूं…’ वह रोते हुए कहती है कि कई बार आत्महत्या का ख्याल आता है, लेकिन बच्चों का चेहरा सामने आ जाता है. फिर कुछ पल के लिए चुप हो जाती है. जैसे उसके पास कहने को कुछ बचा ही नहीं हो.

एक कहानी, कई सवाल

रितु की कहानी को सिर्फ पति की बेवफाई की कहानी मानकर आगे बढ़ जाना आसान है. लेकिन इसके पीछे कई बड़े सवाल हैं. क्या विवाह की परिभाषा बदल रही है? क्या प्रेम और प्रतिबद्धता के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है? क्या व्यक्तिगत खुशी अब पारिवारिक जिम्मेदारियों से ऊपर होती जा रही है? और सबसे बड़ा सवाल-जब एक पक्ष रिश्ते को जीवन भर का बंधन मानता हो और दूसरा पक्ष उसे खत्म कर किसी दूसरे रिश्ते में जाने का फैसला कर ले, तो टूटता कौन है? सिर्फ पति-पत्नी का रिश्ता या पूरा परिवार? रितु के मामले में दो मासूम बच्चे भी हैं. उनके लिए मां-पिता सिर्फ दो व्यक्ति नहीं, उनका पूरा संसार हैं. यही वजह है कि रितु अपने टूटते विवाह के बीच भी खुद को संभालने की कोशिश कर रही है. क्योंकि उसके पास टूट जाने की इजाजत नहीं है. उसके सामने बच्चों के चेहरे हैं. और पीछे एक ऐसी जिंदगी, जिसे उसने कभी सात जन्मों के लिए अपना माना था. एक तरफ सात फेरे हैं. दूसरी तरफ लिव-इन का फैसला. इन दोनों के बीच खड़ी है रितु-एक ऐसी पत्नी, जिसके लिए विवाह आज भी सात जन्मों का रिश्ता है, लेकिन जिसका पति उस रिश्ते से बाहर निकलने का फैसला कर चुका है. और यही सवाल इस पूरी कहानी को सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं रहने देता. यह सवाल बन जाता है-रिश्ते बदल रहे हैं या रिश्तों को देखने वाली हमारी पूरी दुनिया बदल रही है?

बेवफाई : नयी आजादी या रिश्तों का संकट

पति-पत्नी के संबंधों और विवाहेतर संबंधों पर मनोवैज्ञानिक डॉ विजय नागास्वामी की पुस्तक थ्री इज ए क्राउड : अंडरस्टैंडिंग एंड सर्वाइविंग इनफिडेलिटी में भी विस्तार से चर्चा की गयी है. उनके अनुसार कुछ लोग विवाहेतर संबंध को यह कहकर जायज ठहराते हैं कि इंसान एक साथ एक से अधिक लोगों से प्रेम कर सकता है. लेकिन सवाल यह है कि प्रेम और प्रतिबद्धता का अर्थ क्या है? एक से अधिक लोगों के प्रति आकर्षण होना अलग बात है और उन आकर्षणों को रिश्तों में बदल देना अलग. डॉ नागास्वामी के अध्ययन में यह भी सामने आया कि विवाहेतर संबंधों से जुड़ी मानसिक परेशानियां कम नहीं हैं. उनका अनुभव था कि पहले ऐसे संबंध अक्सर विवाह के कई वर्षों बाद सामने आते थे, जबकि बाद के वर्षों में कम अवधि में भी ऐसे मामले सामने आने लगे. मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और इंटरनेट ने छिपे हुए रिश्तों को जन्म देने के साथ-साथ उन्हें उजागर करना भी आसान कर दिया है. चैट, कॉल और डिजिटल रिकॉर्ड कई बार उस सच को सामने ला देते हैं, जिसे रिश्तों की दीवारों के भीतर छिपा समझा जाता था.

पहली प्रतिबद्धता खुद से है

हाल ही में पटना की एक खबर पर नजर पड़ी. एक महिला दस साल से शादीशुदा थी. पांच साल से उसका विवाहेतर संबंध था. वह अपने पति को पसंद नहीं करती थी, लेकिन उसे छोड़ना भी नहीं चाहती थी, क्योंकि वह उसकी बेटी के लिए अच्छा पिता था. उसकी दोस्त ने उसे समझाया-‘हमारी पहली प्रतिबद्धता खुद के प्रति है. पहले अपनी खुशी आनी चाहिए.’ यही वह सोच है, जहां से सवाल पैदा होता है—क्या व्यक्तिगत खुशी ही जीवन का अंतिम सत्य है? अगर अपनी खुशी के लिए हर रिश्ता, हर जिम्मेदारी और हर प्रतिबद्धता पीछे छोड़ दी जाये, तो परिवार किस आधार पर टिकेगा?

रिश्तों की बाढ़ से पहले बांध टूटते हैं

नदी जब अपनी सीमा तोड़ती है, तो पहले बांध टूटता है. उसके बाद पानी फैलता है और फिर बाढ़ आती है. समाज में भी ऐसा ही होता है. मर्यादा अचानक खत्म नहीं होती. पहले छोटी-छोटी सीमाएं टूटती हैं. फिर अपराधबोध कम होता है. उसके बाद गलत को सही ठहराने के तर्क पैदा होते हैं. अंततः वही चीज सामान्य लगने लगती है, जिसे कभी समाज स्वीकार नहीं करता था. भोग की असीम लालसा, बढ़ता व्यक्तिवाद, रिश्तों में घटती प्रतिबद्धता और ‘मेरी खुशी सबसे पहले’ की मानसिकता—क्या यही उस बदलाव के मूल में हैं?

घर तो रह जायेंगे, परिवार नहीं

कभी परिवार का अर्थ था-‘हम’. फिर वह ‘मैं और मेरा परिवार’ हुआ. और अब कहीं-कहीं यह सिर्फ ‘मैं’ तक सिमटता जा रहा है. रितु की आंखों में फिर आंसू हैं. वह कहती है—‘मैं मरना चाहती हूं, लेकिन बच्चों का चेहरा सामने आ जाता है.’ उसके सामने जिंदगी और मौत के बीच सिर्फ दो मासूम चेहरे खड़े हैं. सवाल यह नहीं कि रितु कितनी मजबूत है. सवाल यह है कि एक इंसान को अपने ही रिश्तों के बीच जीने के लिए इतना संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? और इससे भी बड़ा सवाल-अगर घर ही इंसान के लिए सबसे असुरक्षित जगह बनने लगे, तो वह आखिर जाए कहां? रिश्ते सिर्फ खून, शादी या सामाजिक पहचान से नहीं बनते. रिश्ते भरोसे, मर्यादा, जिम्मेदारी और त्याग से बनते हैं. जिस दिन इन चारों में से एक-एक कर सब खत्म होने लगेंगे, उस दिन घर तो रह जायेंगे, लेकिन परिवार नहीं.

इसे भी पढ़ें : भागलपुर की हर घर जल योजना पर नया संकट, रैयतों के विवाद में फंसा 7.56 करोड़ का मुआवजा और निर्माण कार्य

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