स्कूल जाने के लिए बच्चों को चलानी पड़ती नाव:पुल निर्माण कार्य 9 महीने से ठप; नदी पार करने के लिए प्रशासन ने ना दिया नाव, ना नाविक

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नालंदा में सकरी नदी पर सीएम ग्रामीण सेतु योजना से 6.20 करोड़ में एक पुल बनना है। निर्माण कार्य शुरू होते ही ठप चुका है। पुल नहीं बनने सकुचीडीह और कसुचीसराय गांव के लोगों को हर दिन परेशानी होती है। ये दोनों गांव बिहार शरीफ से 30 किलोमीटर दूर गिरियक प्रखंड की गाजीपुर पंचायत में है। दोनों गांव में 1-1 हजार की आबादी है। इतनी बड़ी आबादी के लिए न पुल है, न नाव की अच्छी व्यवस्था और न ही प्रशिक्षित नाविक। नदी को पार करने के लिए सिर्फ एक नाव है। जिसे नाविक नहीं गांव के बच्चे ही चलाते हैं। नाव चलाना इनका काम नहीं बल्कि इनकी मजबूरी है। हालात ने इन्हें नाव चलाना सिखा दिया है। स्कूल जाना हो तो बच्चों को खुद से नाव चलाकर नदी क्रॉस कर करना पड़ता है। अगर नदी से नहीं जाएंगे तो 8 किमी दूर घूमकर सड़क मार्ग से जाना होगा, जो गांव वालों के लिए काफी दूर हो जाता है। नदी से जाने पर 1 किमी की दूरी पड़ती है। स्वास्थ्य सुविधाएं नदी के पार सकरी नदी ने गाजीपुर पंचायत को 2 भौगोलिक हिस्सों में बांट दिया है। एक तरफ सकुचीडीह गांव और कतरीसराय प्रखंड के कोयरी बीघा, मैरा और बरिठ गांव हैं, तो दूसरी तरफ सकुचीसराय है।
सकुचीडीह के लोगों की पूरी जिंदगी सकुचीसराय पर निर्भर है। सकुचीसराय में मुख्य बाजार है, प्लस टू (10+2) विद्यालय है और सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक चिकित्सा और मेडिकल सुविधाएं भी नदी के उसी पार हैं। नदी की चौड़ाई 100 मीटर है। नदी पार करने के बाद करीब 900 मीटर पैदल चलना पड़ता है तब सकुचीसराय का मार्केट आता है। कुल मिलाकर नदी के रास्ते एक किमी का सफर है। बरसात के दिनों में जब नदी उफान पर होती है तो गांव वालों को मजबूरी में सड़क मार्ग चुनना पड़ता है। जो करीब 8 किमी का लंबा और घुमावदार सफर है। आसपास के इलाके में 2 पुल हैं। एक 5 किमी दूर गोवर्धन बीघा में है और दूसरा 8 किमी दूर मानपुर में है। ग्रामीणों ने इन्हीं दो पुल के सहारे सकुचीसराय गांव जाना पड़ता है।
स्कूली बच्चे गांव के लोगों को पार कराते हैं नदी जब सुबह स्कूली बच्चे नदी किनारे पहुंचते हैं तो नदी पार कराने के लिए कोई नाविक नाव पर नहीं होता है। 10-12 साल के किशोर खुद ही नाव को पानी में धक्का देते हैं और चप्पू चलाने लगते हैं। गांव के कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें नाव चलानी नहीं आती है। वे नदी किनारे बैठे रहते हैं कि कोई आए तो वे उनके साथ नाव पर बैठकर नदी पार कर सके। ऐसी स्थिति में स्कूल के बच्चे भी उनकी मदद कर देते हैं। गांव के लोगों को बच्चे अपने साथ नाव पर बैठा लेते हैं। गांव की महिलाओं ने बताई अपनी-अपनी परेशानियां…
सरकार से हाथ जोड़कर अपील करती हूं हमें हमारा पुल दे दें
स्थानीय ग्रामीण संगीता देवी कहती हैं कि हम सरकार से हाथ जोड़कर अपील कर रहे हैं कि किसी भी तरह हमें हमारा पुल दे दीजिए। बार-बार पुल की बात होती है, फिर कोई न कोई अड़चन आ जाती है। हमें बहुत तकलीफ होती है। जिन्हें नाव चलानी नहीं आती, वे घंटों किनारे पर बैठे रहते हैं। अब तो मजबूरी में औरतों और लड़कियों को भी नाव चलानी पड़ती है। कल ही की बात है, संतुलन बिगड़ने से मैं गिर गई और मेरा मोबाइल नदी में गिरकर डूब गया। घूमकर जाने में इतना समय और पैसा बर्बाद होता है। एक बार मिट्टी जांच वाले आए थे, लगा कि अब काम होगा, लेकिन फिर सब रुक गया।
शादी के 20 साल हो गए, आज तक पुल नहीं बना रीता देवी बताती हैं कि मेरी शादी को 20 साल से ज्यादा हो गए हैं। जब मैं इस गांव में ब्याह कर आई थी, तब से यही हाल देख रही हूं। आज तक पुल नहीं बना। छोटे-छोटे बच्चों को नाव चलाने नहीं आती, फिर भी उन्हें स्कूल जाना है। कई बार नाव पलटने से लोग डूब कर मर भी गए हैं, लेकिन प्रशासन नहीं जागता। नाव भी सरकार ने नहीं दी है। हम सभी गांव वालों ने आपस में चंदा इकट्ठा करके इसे खरीदा है, ताकि कम से कम हमारी जिंदगी तो चलती रहे। मिट्‌टी जांच हुई थी, फिर कुछ नहीं हुआ बोर्ड पर ‘शिलान्यास’ के अक्षरों के नीचे राजगीर के विधायक कौशल किशोर, नालंदा के सांसद कौशलेन्द्र कुमार, एमएलसी रीना यादव और पूर्व विधायक इंजीनियर सुनील के नाम हैं। योजना के अनुसार, 30 जुलाई 2025 को इस पुल का निर्माण कार्य शुरू हो जाना चाहिए था। अभी फरवरी 2026 का अंतिम सप्ताह चल रहा है। निर्माण शुरू हुए लगभग 9 महीने बीत जाने चाहिए थे, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार, मिट्टी की जांच (सर्वे) के नाम पर जो थोड़ा बहुत काम शुरू हुआ था, वह भी अब पूरी तरह से ठप पड़ा है। संवेदक (प्रकाश कन्स्ट्रक्शन) और विभागीय अधिकारी नदारद हैं। नदी के कटाव से भी डरे हैं ग्रामीण पुल न होने की समस्या के साथ-साथ एक और बड़ी आपदा सकुचीडीह गांव के सिर पर मंडरा रही है। नदी कटाव भी कर रही है। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से नदी के तटबंध की मरम्मत नहीं की गई है। इसके कारण नदी की धारा धीरे-धीरे गांव की तरफ बढ़ रही है।
अगर मानसून से पहले तटबंधों को मजबूत नहीं किया गया और बाढ़ का पानी कई घरों में घुस जाएगा।

मेडिकल इमरजेंसी में सबसे ज्यादा होती परेशानी दिन के उजाले में तो लोग किसी तरह जद्दोजहद करके गांव वाले नदी पार कर लेते हैं, लेकिन असली खौफ रात के अंधेरे में शुरू होता है। अगर रात के समय गांव में किसी महिला को प्रसव पीड़ा उठ जाए, किसी बुजुर्ग को हार्ट अटैक आ जाए या कोई अन्य मेडिकल इमरजेंसी हो जाए, तो स्थिति बेहद भयावह हो जाती है। रात में नाव चलाना और भी खतरनाक है। ऐसे में मरीजों को खाट पर लादकर या गाड़ी की व्यवस्था करके गोवर्धन बीघा या मानपुर के रास्ते 8 किलोमीटर घुमाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है। लंबी दूरी को तय करने में ‘गोल्डन आवर’ (इलाज का अहम समय) बर्बाद होता है, वह कई बार मरीजों की जान पर भारी पड़ जाता है।
डीपीआर को फाइनल मंजूरी नहीं मिली है राजगीर, ग्रामीण कार्य विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर मुनिता कुमारी ने बताया, ‘सकुचीसराय के पास सकरी नदी पर पुल बनना है। शिलान्यास भी हो चुका है, लेकिन वरीय अधिकारियों के आदेश पर डीपीआर फिर से जांच के लिए मुख्यालय भेजी गई है। अबतक स्वीकृत होकर वापस नहीं आई है। इस कारण से निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं हुआ है। उम्मीद है कि जल्द ही फाइनल मंजूरी मिल जाएगी। उसके बाद काम प्रारंभ कर दिया जाएगा।’

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