Wednesday, June 24, 2026

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नौकरी छोड़ शुरू की नर्सरी, अब दे रहे जॉब:10 हजार से डेढ़ लाख पौधों तक पहुंचा कारोबार, कई जिलों से खरीदारी के मिल रहे ऑर्डर


धनबाद जिले के धोकरा निवासी अशोक मंडल ने सरकारी या निजी नौकरी की तलाश करने वाले युवाओं के विपरीत स्वरोजगार का मार्ग चुना। उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़कर अपनी नर्सरी शुरू की, जो आज क्षेत्र में एक पहचान बना चुकी है। अशोक मंडल एसबीआई के जर्नल ऑफिस, बैंक मोड़ में मैसेंजर के पद पर कार्यरत थे। उन्हें प्रतिमाह लगभग 9200 रुपए वेतन मिलता था। करीब सात साल तक नौकरी करने के बाद, वर्ष 2014 में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया। आज वो 5 लाख रुपए सलाना तक कमाई कर ले रहे हैं। नर्सरी चलाने का तरीका सीखा
अशोक बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही खेती और पौधों से लगाव था। बैंक में काम करते हुए, एक कृषि प्रबंधक ने उन्हें पौधों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने प्रबंधक से बीज लगाने, पौधों की देखभाल, मिट्टी तैयार करने और नर्सरी चलाने के तरीके सीखे, जिसके बाद उन्होंने इस क्षेत्र में आगे बढ़ने का फैसला किया। वर्ष 2019 में अशोक मंडल ने छोटे स्तर पर नर्सरी की शुरुआत की। उन्होंने लगभग 10 हजार पौधे लगाए। अपनी कड़ी मेहनत और उचित देखभाल के कारण, उन्हें शुरुआती दौर में ही लगभग डेढ़ लाख रुपए का फायदा हुआ। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपनी नर्सरी का विस्तार करना शुरू किया। 200 से अधिक किस्मों के पौधों उपलब्ध
आज उनकी नर्सरी में डेढ़ लाख से अधिक पौधे मौजूद हैं। यहां फूलों, फलदार पेड़, औषधीय, सब्जियों और बागवानी से संबंधित विभिन्न प्रकार के पौधे उपलब्ध हैं। उनकी नर्सरी में 200 से अधिक किस्मों के पौधों की वैरायटी मिलती है। अशोक मंडल की नर्सरी अब केवल धनबाद जिले तक ही सीमित नहीं है। धनबाद के अलावा, जामताड़ा, रांची, गिरिडीह, गोड्डा, पाकुड़, हजारीबाग और डाल्टनगंज सहित कई जिलों से लोग यहां पौधे खरीदने और ऑर्डर देने आते हैं। यह नर्सरी कई लोगों को रोजगार भी प्रदान कर रही है। नर्सरी में 8 स्टाफ काम कर रहे
नर्सरी के जरिए अशोक मंडल खुद आत्मनिर्भर बने ही हैं, साथ ही दूसरे लोगों को भी रोजगार दे रहे हैं। वर्तमान में उनकी नर्सरी में करीब 8 लोग काम कर रहे हैं। वहीं, सीजन के समय यह संख्या बढ़कर 12 से 15 लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है। हालांकि सफलता के बाद भी अशोक मंडल के सामने कुछ चुनौतियां हैं। उनका कहना है कि अभी तक उन्हें किसी तरह की सरकारी सहायता या सब्सिडी नहीं मिली है। सिंचाई के लिए बिजली की समस्या रहती है, जिससे पौधों की देखभाल प्रभावित होती है। अशोक मंडल की कहानी बताती है कि अगर मेहनत, सीखने की इच्छा और आत्मविश्वास हो तो सीमित संसाधनों के बावजूद खुद का रोजगार खड़ा किया जा सकता है और दूसरों को भी रोजगार दिया जा सकता है।

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