
कोलकाता से शिव कुमार राउत की रिपोर्ट
वैश्विक जलवायु परिवर्तन का बहुत बुरा असर अब महानगर कोलकाता पर भी साफ देखने को मिल रहा है. बदलते पर्यावरण के कारण जहां एक ओर मानसून में बारिश का पूरा पैटर्न बदल गया है, वहीं दूसरी ओर कोलकाता की पारंपरिक जल निकासी व्यवस्था (ड्रेनेज सिस्टम) काफी पुरानी और नाकाफी साबित हो रही है. नतीजतन, मानसून के दौरान कोलकाता के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले नागरिकों को भारी जलजमाव और दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. इस गंभीर संकट को देखते हुए कोलकाता नगर निगम के ड्रेनेज विभाग ने एक बेहद आधुनिक और व्यावहारिक समाधान निकाला है. इस नयी पहल के जरिए विभाग का लक्ष्य एक साथ दो बड़ी नागरिक समस्याओं को हल करना है.
50 से अधिक स्थानों पर शुरू हुआ काम, रिचार्ज होगा भूजल
ड्रेनेज विभाग ने कोलकाता में ‘वॉटर पॉकेट्स’ यानी जलजमाव वाले सबसे प्रभावित क्षेत्रों के रूप में 50 से अधिक स्थानों की पहचान की है. इन सभी चयनित जगहों पर बारिश के पानी को तुरंत इकट्ठा करने के लिए विशेष भूमिगत जलाशय बनाये जा रहे हैं. भारी बारिश के दौरान सड़कों पर जमा होने वाले पानी को इन जलाशयों में मोड़ा जायेगा. इसके बाद आधुनिक मशीनों और वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके इस जमा पानी को पूरी तरह फिल्टर किया जायेगा. साफ किये गये इस पानी को मजबूत पाइपों के माध्यम से सीधे जमीन के नीचे भेजा जायेगा, जिससे महानगर के तेजी से घटते भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल) को फिर से भरने और रिचार्ज करने में बड़ी मदद मिलेगी. शहर भर में 50 से अधिक स्थानों पर इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम पहले ही शुरू किया जा चुका है.
ड्रेनेज नेटवर्क की क्षमता से अधिक होती है बारिश
मौसम के अनियमित पैटर्न की वजह से कोलकाता में हर साल कम समय में भारी बारिश दर्ज की जा रही है. यह अचानक होने वाली तेज बारिश पूरे महानगर को जलमग्न कर देती है, क्योंकि जमा होने वाला पानी कोलकाता के ड्रेनेज नेटवर्क की एक घंटे के भीतर नहरों में पानी पंप करने की सीमित क्षमता से कहीं अधिक होता है. नतीजतन, जलस्तर घंटों तक कम नहीं होता और सड़कों, गलियों, दुकानों तथा घरों में बड़े पैमाने पर पानी भर जाता है. इस समस्या को स्थायी रूप से हल करने के लिए निगम के तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा लंबे समय से गहन योजना बनायी जा रही थी, जिसके बाद आखिरकार यह वाटर रिचार्जिंग का समाधान खोजा गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि यह पहल जलभराव के खतरे को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती, लेकिन इससे संकट की तीव्रता काफी हद तक कम हो जायेगी.
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90 मीटर की गहराई तक पहुंचेगा साफ पानी
निगम के एक वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी ने परियोजना की कार्यप्रणाली स्पष्ट करते हुए बताया कि शुरुआत में इस योजना को 50-55 चिह्नित वॉटर पॉकेट्स में युद्धस्तर पर लागू किया जा रहा है. वहां आधुनिक फिल्ट्रेशन यूनिट्स लगायी जा रही हैं. सड़क पर जमने वाले पानी को प्रोसेस करने के बाद पाइप के जरिये जमीन के नीचे करीब 70 से 90 मीटर की गहराई पर मौजूद प्राकृतिक रेतीली परत तक सुरक्षित पहुंचाया जायेगा. इससे प्रदूषित पानी के बजाय पूरी तरह साफ पानी जमीन के भीतर जायेगा और धीरे-धीरे शहर का भूजल स्तर फिर से ऊपर आ जायेगा. ड्रेनेज विभाग इस शुरुआती चरण की सफलता और नतीजों के आंकलन के बाद इस आधुनिक उपाय को महानगर के कई अन्य जलभराव वाले इलाकों में भी विस्तार देगा.
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