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‘सच्चाई जो हो मगर जनता मानती है कि भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाया है। इसी गुस्से में ज्यादातर लोगों ने NDA को वोट नहीं दिया।’ JDU विधायक अनंत सिंह के इस बयान के बाद चर्चा है कि हार का एक कारण नीतीश कुमार को हटाना है। क्या वाकई नीतीश कुमार को हटाने के कारण BJP हारी, या कोई और कारण है, समझेंगे; बूझे की नाही में…। क्या नीतीश कुमार को हटाने के कारण बांकीपुर में BJP हारी? चुनावी आंकड़ों से देखें तो जवाब है-बिल्कुल नहीं। क्योंकि बांकीपुर BJP की 1995 से परंपरागत सीट रही है। यहां BJP तब भी जीती जब उसके साथ नीतीश कुमार नहीं थे। 2015 विधानसभा चुनाव में तो बांकीपुर के वोटरों ने नीतीश कुमार को CM पद से हटाने के लिए वोट किया था। इसे ऐसे समझिए… इसका मतलब बांकीपुर में नीतीश कुमार कोई फैक्टर नहीं हैं। जब उनके लिए पूरे बिहार में लहर थी, तब भी इस सीट पर भाजपा जीती थी। …तो फिर नीतीश कुमार से क्यों जोड़ा जा रहा? सीधे तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है, लेकिन इस तरह की बातों के पीछे प्रेशर पॉलिटिक्स बड़ा कारण है। इसे ऐसे समझिए… चूंकि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद यह पहला चुनाव था। इसलिए स्वभाविक तौर पर चुनाव के रिजल्ट को इससे जोड़ा जा रहा है। हालांकि, JDU ने ऑफिशियली इस तरह के बयानों से खुद को किनारे कर लिया है। बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने कहा, ‘हार-जीत लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। हम आरोप नहीं लगाते। हमारा आधार वोट सुरक्षित है। समीक्षा की जरूरत है।’ …फिर तब बांकीपुर में BJP क्यों हारी? 1. बड़े नेताओं के अहंकार से कार्यकर्ता नाराज पार्टी सूत्रों के मुताबिक, हार का सबसे बड़ा कारण पार्टी के बड़े नेताओं का अहंकार था। कार्यकर्ता नेताओं के व्यवहार से नाराज थे। वह ना कार्यकर्ताओं की भावनाओं का ख्याल रखते थे और ना उनकी बात सुनते थे। यही कारण है कि कार्यकर्ताओं ने ड्यूटी तो की, लेकिन सिर्फ दिखावे की। इसी का नतीजा है कि पार्टी के बड़े नेताओं नितिन नवीन का जहां बचपन गुजरा पीरमुहानी इलाके के बूथ पर भाजपा को सिर्फ 88 वोट मिले। जबकि, जनसुराज को 152 वोट मिले। 2. दिल्ली-पटना की अंदरूनी खींचतान पॉलिटिकल सर्किल में चर्चा है कि बांकीपुर में भाजपा की यह हार पार्टी की दिल्ली और पटना की अंदरूनी खींचतान का नतीजा है। सूत्रों के मुताबिक, बिहार भाजपा के नेता नितिन नवीन के एकतरफा कैंडिडेट सिलेक्शन से नाराज थे। यहां से जितने लोगों का नाम कैंडिडेट के तौर पर गया था, उसको नजरअंदाज कर प्रत्याशी दिया गया। बिहार कमेटी प्रशांत किशोर के सामने बड़ा चेहरा उतराना चाहती थी, लेकिन दिल्ली से एक सामान्य कार्यकर्ता को उतार दिया गया। जिसे पूरे विधानसभा एरिया में भी लोग ठीक से नहीं जानते थे। वहीं, पार्टी का एक धड़ा सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से नाराज है। सियासी गलियारे में चर्चा है कि बांकीपुर में एक हार से 2 निशाने साधे गए हैं। 3. ओवर कॉन्फिडेंस और प्रशांत किशोर को काउंटर नहीं कर पाई BJP प्रशांत किशोर ने पूरे चुनावी कैंपेन को राज्य की शिक्षा व्यवस्था, रोजगार और विकास को केंद्र में रखा। उन्होंने सरकारी स्कूलों को बेहतर करने, लोगों का पलायन रोकने की बातें कहीं। साथ ही उन्होंने बिहार की तुलना गुजरात से की। 4. UGC और कमजोर प्रत्याशी से सवर्ण नाराज जनवरी में आए UGC इक्विटी रेगुलेशंस से सवर्ण समाज नाराज था। जहानाबाद NEET स्टूडेंट रेप-मर्डर केस और भरत तिवारी एनकाउंटर ने इस नाराजगी को और बढ़ा दिया। गैर कायस्थ सवर्णों (भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत) में नाराजगी वोटिंग के पहले और वोटिंग के दिन जमीन पर साफ दिख रही थी। इसकी भनक BJP को पहले से थी। यही कारण है कि भाजपा ने मैन टू मैन मार्किंग की। अपने सवर्ण नेताओं को गली-गली, सोसाइटी-सोसाइटी घुमाया। 40 स्टार प्रचारकों में से 15 सवर्ण रखे। अलग-अलग बैठकें की। लेकिन सब फेल हो गया। नीरज PK के सामने टिक नहीं पाए…

