
मुख्य बातें
Mukul Roy-TMC: कोलकाता. बंगाल की राजनीति में चाणक्य कहे जानेवाले मुकुल रॉय का सियासी सफर युवा कांग्रेस के नेता के रूप में शुरू हुआ. 17 अप्रैल 1954 में जन्मे मुकुल रॉय जल्द ही पार्टी में सक्रिय नेता के रूप में पहचान बना ली. किसी भी विधानसभा में मुकुल रॉय को हर तरह की शक्ति और कमजोरी का वाकिफ ज्ञान था. यही उनकी ताकत थी. वे जिले से लेकर शहर तक, हर ब्लॉक या बूथ स्तर पर जाने जाते थे. ममता बनर्जी ने मुकुल रॉय की इसी क्षमता को पहचाना और उन्हें अपनी टीम का हिस्सा बनाया. वे उन्हें दीदी कहकर सम्मान देते थे. ममता बनर्जी ने भी उन्हें भाई जैसा स्नेह दिया. वे हर साल भाईफोन्ता देते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न कारणों से रिश्तों में दरार आयी और यह परंपरा बाधित रही.
युवा कांग्रेस से शुरू किया था राजनीतिक सफर
मुकुल रॉय तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. जब ममता बनर्जी ने 1998 में राष्ट्रीय कांग्रेस को भंग करके अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन किया, तो मुकुल रॉय हमेशा उनके साथ खड़े रहे. काफी समय तक मुकुल अपने परिवार के साथ तिलजाला स्थित तृणमूल पार्टी कार्यालय में ही रहते थे. ममता बनर्जी की तरह बंगाल की आम जनता के बीच तृणमूल कांग्रेस को लोकप्रिय बनाने में मुकुल रॉय की भूमिका और योगदान निर्विवाद है. मुकुल रॉय सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के प्रमुख चेहरों में से एक थे. मुकुल रॉय ने तृणमूल स्तर पर संगठन का काम किया. उनकी मेहनत रंग लाई जब 2006 में उन्हें तृणमूल कांग्रेस का अखिल भारतीय महासचिव बनाया गया. वे पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता थे. 2001 में, मुकुल रॉय ने पहली बार जगद्दल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा. हालांकि, वे फॉरवर्ड ब्लॉक के उम्मीदवार हरिपाड़ा बिस्वास से हार गए.
दिल्ली में तृणमूल के चेहरे थे मुकुल
मुकुल रॉय के अटूट हौसले ने उनकी तरक्की को कभी नहीं रोका. 2006 में उन्हें तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया. मुकुल रॉय दिल्ली में तृणमूल का चेहरा थे. वे 2009 से 2012 तक राज्यसभा में तृणमूल पार्टी के नेता रहे. वे 2017 तक सांसद रहे. मुकुल रॉय 2011 के चुनावों में तृणमूल के प्रमुख नेताओं में से एक थे. मुकुल 2006 के भूमि आंदोलन के दौरान फिर से सक्रिय हो गए. ममता बनर्जी ने स्वयं उन्हें अपने दूसरे सबसे महत्वपूर्ण नेता के रूप में पेश किया. उन्होंने 2013 के पंचायत चुनावों में संगठनात्मक नेतृत्व प्रदान किया. दूसरे यूपीए शासनकाल में मुकुल रॉय जहाजरानी मंत्री बने. 2012 में, ममता बनर्जी ने रेल बजट में किराया वृद्धि से असंतोष के कारण तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे की मांग की. दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे के बाद, मुकुल रॉय अगले रेल मंत्री बने.
भाजपा से नहीं टूट पाया रिश्ता
2017 में मुकुल और ममता के रिश्ते में दरार आयी ओर यह सिलसिला टूट गया. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए. मुकुल रॉय के नेतृत्व में डेढ़ साल तक दल-बदल कार्यक्रम चलाया गया. उन्होंने कांग्रेस से वामपंथी दलों के कई सहयोगी दलों को अलग किया और नेताओं और कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर लाया. बंगाल की राजनीति में ‘सत्ता-संपन्न दलों की खरीद-फरोख्त’ का चलन शुरू हो गया. उन्होंने कृष्णानगर से भाजपा के टिकट पर चुनाव भी जीता. फिर 2021 में, वे अभिषेक बनर्जी से पार्टी का झंडा लेकर फिर से तृणमूल में लौट आए. हालांकि, मुकुल रॉय तृणमूल कांग्रेस में लौट आये जरूर, लेकिन तकनीकी तौर पर वह आज भी भाजपा के ही नेता हैं. दल बदल के दल दल में फंसे मुकुल रॉय कुछ समय से सक्रिय राजनीति में नजर नहीं आए हैं.
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