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सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के दुमका में हुए एक दोहरे हत्याकांड मामले में लगभग 45 साल तक चले मुकदमे को “न्यायिक व्यवस्था की विफलता” करार देते हुए, 70 वर्षीय एक व्यक्ति की सजा पर रोक लगाकर उसे रिहा करने का आदेश दिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की लंबी सुनवाई को न्यायिक व्यवस्था की विफलता बताया। कोर्ट ने कहा कि अपराध के बाद आरोपियों को 22 साल तक लंबी सुनवाई का सामना करना पड़ा और दोषसिद्धि के बाद अपील के निपटारे में भी दो दशक से अधिक समय लग गया। इस मामले में छह लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से दो की आरोप तय होने से पहले ही मौत हो गई, जबकि दोषी ठहराए गए चार आरोपियों में से तीन की हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो गई। अब केवल करीब 70 वर्षीय साइमन सोरेन ही बचे हैं। उन्हें कई बीमारियां हैं और वह हिरासत में अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साइमन सोरेन की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उनकी सजा निलंबित कर तत्काल रिहाई का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा-दोहरे हत्याकांड जैसे भयानक अपराध के बावजूद, हम पिछले 45 सालों में आरोपी द्वारा झेली गई तकलीफों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। खासकर उनकी मेडिकल स्थिति और राज्य के उस हलफनामे को देखते हुए, जिसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ता अस्पताल में भर्ती है (भले ही वह कस्टडी में है), हम सजा पर रोक लगाते हैं और निर्देश देते हैं कि याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा किया जाए। बशर्ते वह ज़मानत पर रहने के दौरान कोई अपराध न करे और अपनी पर्सनल श्योरिटी दे।” मामले में हाईकोर्ट ने 28 अक्टूबर 2024 को साइमन सोरेन की अपील खारिज करते हुए 2002 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था। इसके बाद उन्होंने हिरासत में आत्मसमर्पण किया था। 1991 में आरोप तय, फिर भी 12 साल में पूरा हुआ ट्रायल
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई में हुई देरी के कारणों पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पहले झारखंड हाईकोर्ट से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी कि ट्रायल और आपराधिक अपील के निपटारे में इतनी देरी क्यों हुई। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से दाखिल हलफनामे में बताया गया कि आरोपियों के छह साल तक फरार रहने के कारण ट्रायल में देरी हुई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1991 में आरोप तय होने के बाद ट्रायल पूरा होने में 12 साल लगने की कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई गई है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोप तय होने के बाद 11 वर्षों के दौरान यह मामला पांच बार एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित हुआ। हाईकोर्ट की रिपोर्ट में आपराधिक अपीलों की भारी लंबितता का भी उल्लेख है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार को भी मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है। 1981 में धान कटाई के दौरान हुआ था दोहरा हत्याकांड मामला 18 अक्टूबर 1981 का है। दुमका जिले के भुरुंडिया गांव में बिभूति मंडल, बनारसी मंडल, क्षीर सागर मंडल और उनके भतीजे जगदीश मंडल व सत्यनारायण मंडल धान काटने गए थे। अभियोजन के अनुसार, नदी के पास पहुंचने पर संथाल समुदाय के लोग ढोल बजाकर धनुष-बाण और कुल्हाड़ी जैसे हथियारों के साथ जुटे और मंडल परिवार के सदस्यों की हत्या करने का एलान किया। मंडल परिवार के लोगों ने भागने की कोशिश की, लेकिन उनका पीछा किया गया। आरोप था कि जेठुन सोरेन ने बिभूति मंडल को तीर मारा और इसके बाद साइमन सोरेन ने भी उन पर तीर चलाया। बनारसी मंडल पर भी दोनों आरोपियों ने तीर चलाए। दोनों के गिरने के बाद उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले में जगदीश और सत्यनारायण मंडल सूचक बने थे। करीब चार दशक बाद हाईकोर्ट ने 2024 में अपील का निपटारा किया। अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मूल रिकॉर्ड की भौतिक और डिजिटल प्रतियां चार सप्ताह के भीतर मंगाई हैं और अगली सुनवाई 18 सितंबर को तय की है। कोर्ट ने संकेत दिया है कि उसकी चिंता केवल इस मामले तक सीमित नहीं, बल्कि आपराधिक अपीलों के लंबे समय से लंबित रहने की व्यापक समस्या को लेकर भी है।
