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Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष 2026 की प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर की रात 10:18 बजे शुरू होगी, जबकि प्रतिपदा का पहला श्राद्ध 27 सितंबर को किया जाएगा. इसके साथ ही देशभर के प्रमुख तीर्थस्थलों पर तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान का सिलसिला शुरू हो जाएगा. पितरों की तृप्ति और उनकी सद्गति के लिए गया, काशी, प्रयागराज और हरिद्वार जैसे तीर्थों में इन कर्मकांडों का विशेष महत्व माना जाता है.
श्राद्ध और पिंडदान की चर्चा होते ही सबसे पहले गयाजी का नाम आता है. लेकिन काशी की एक धार्मिक परंपरा ऐसी भी है, जिसके अनुसार विशेष रूप से अकाल मृत्यु के मामलों में गया जाने से पहले काशी में श्राद्ध और पिंडदान कराया जाता है. आखिर इसके पीछे क्या मान्यता है और काशी के किन स्थानों पर यह कर्मकांड होता है?
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गया से पहले काशी में पिंडदान क्यों?
काशी के धार्मिक मामलों के जानकार और ज्योतिषविद् पंडित संजय उपाध्याय के अनुसार, पितृपक्ष में श्रद्धालु देश के अलग-अलग तीर्थस्थलों पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध और पिंडदान करने जाते हैं. काशी की स्थानीय धार्मिक परंपरा में माना जाता है कि गया में पिंडदान से पहले काशी में कर्मकांड कराने का अलग महत्व है.
इसके पीछे मान्यता है कि जिन लोगों की मृत्यु असमय, दुर्घटना, आत्महत्या, हत्या या किसी अन्य अस्वाभाविक परिस्थिति में हुई हो, उनकी आत्मा की शांति के लिए पहले काशी में विशेष श्राद्ध कराया जाता है. इसके बाद गयाजी में पिंडदान की प्रक्रिया पूरी की जाती है.
‘प्रेत योनि से पितृ योनि’ की क्या है मान्यता?
पंडित संजय उपाध्याय बताते हैं कि धार्मिक मान्यता के अनुसार अकाल मृत्यु के बाद आत्मा के प्रेत अवस्था में भटकने की आशंका मानी जाती है. काशी के पिशाचमोचन कुंड और मणिकर्णिका घाट पर विधि-विधान से पिंडदान, तर्पण और त्रिपिंडी श्राद्ध कराने से ऐसी आत्मा को प्रेत अवस्था से मुक्ति मिलने और पितृ योनि प्राप्त होने की मान्यता है.
यही कारण है कि अकाल मृत्यु से जुड़े मामलों में कई परिवार पहले काशी पहुंचते हैं. यहां कर्मकांड पूरा करने के बाद वे गया में पिंडदान करते हैं. मान्यता के अनुसार काशी में प्रेत बाधा से मुक्ति का विधान होता है, जबकि गयाजी में किया गया पिंडदान पितरों की तृप्ति और मोक्ष की कामना से जुड़ा है.
पिशाचमोचन कुंड का क्या महत्व है?
वाराणसी स्थित पिशाचमोचन कुंड को अकाल मृत्यु वाले लोगों की आत्मशांति के कर्मकांड के लिए विशेष माना जाता है. यहां नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और पिंडदान जैसे अनुष्ठान कराए जाते हैं. धार्मिक विश्वास है कि इन कर्मकांडों से मृत आत्मा की अतृप्ति दूर होती है और उसे आगे की गति प्राप्त होती है.
मणिकर्णिका घाट का संबंध भी मृत्यु और मोक्ष की काशी परंपरा से है. हालांकि कौन-सा कर्मकांड किस स्थान पर कराया जाए, यह मृत्यु की परिस्थिति, कुल परंपरा और कर्मकांड कराने वाले पुरोहित की सलाह पर निर्भर करता है.
गयाजी में 45 वेदियों पर पिंडदान की परंपरा
पितृपक्ष के दौरान गयाजी में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. यहां विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी, अक्षयवट सहित विभिन्न वेदियों पर पिंडदान किया जाता है. पारंपरिक रूप से 17 दिनों की विस्तृत गया श्राद्ध-विधि में 45 वेदियों का उल्लेख मिलता है. समय और परिस्थितियों के अनुसार एक दिन, तीन दिन, पांच दिन अथवा अधिक अवधि के कर्मकांड भी कराए जाते हैं.
पंडित संजय उपाध्याय के अनुसार गयाजी में श्राद्ध की विधि परिवार की आवश्यकता और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है. इसलिए यात्रा से पहले संबंधित तीर्थ पुरोहित से विधि और अवधि की जानकारी लेना आवश्यक है.
क्या सभी के लिए पहले काशी जाना अनिवार्य है?
यहां एक बात साफ समझना जरूरी है, सभी परिवारों के लिए गया से पहले काशी में पिंडदान करना सार्वभौमिक रूप से अनिवार्य नहीं माना जाता. यह मुख्यतः काशी की स्थानीय धार्मिक परंपरा तथा अकाल या अस्वाभाविक मृत्यु से जुड़े विशेष कर्मकांडों की मान्यता है.
सामान्य मृत्यु की स्थिति में लोग अपनी कुल परंपरा के अनुसार घर, गया, प्रयागराज, हरिद्वार या अन्य तीर्थस्थलों पर श्राद्ध कर सकते हैं. लेकिन अकाल मृत्यु के मामले में काशी के पिशाचमोचन तीर्थ पर कर्मकांड कराने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है.
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