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जमुई के सिकंदरा प्रखंड के कुमार गांव स्थित सिद्धपीठ मां नेतुला धाम में शारदीय नवरात्र के दौरान आस्था का विशेष संगम देखने को मिल रहा है। करीब 2600 वर्ष पुराने धार्मिक इतिहास से जुड़ी मान्यताओं वाले इस धाम में बिहार समेत कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। कोई नेत्र ज्योति की कामना लेकर माता के दरबार में हाजिरी लगा रहा है, तो कोई संतान सुख की मन्नत मांग रहा है। इस सिद्धपीठ की खासियत यह है कि इसकी धार्मिक मान्यताएं हिंदू परंपरा के साथ जैन धर्म के इतिहास से भी जुड़ी हुई हैं। महाष्टमी की रात निशा पूजा की परंपरा मंदिर के मुख्य पुजारी ब्रजकिशोर पांडेय के अनुसार, मां नेतुला धाम का संबंध भगवान महावीर की प्राचीन यात्रा परंपरा से भी माना जाता है। जैन धर्म के पवित्र ग्रंथ कल्पसूत्र और आचारांग सूत्र से जुड़ी परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भगवान महावीर ने गृह त्याग के बाद अपनी पहली रात कुमार गांव में मां नेतुला मंदिर के समीप स्थित वटवृक्ष के नीचे बिताई थी। यह मान्यता इस स्थान को हिंदू और जैन धर्मावलंबियों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण बनाती है। क्षत्रिय कुंड स्थित भगवान महावीर के जन्मस्थान मंदिर के समीप लगे शिलापट पर भी कुमार गांव का नाम अंकित होने की बात कही जाती है। मां नेतुला धाम में नवरात्र के दौरान पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। पुजारी के मुताबिक, महाष्टमी की रात निशा पूजा की परंपरा निभाई जाती है। भक्त पूरे नौ दिनों तक करते हैं फलाहार इस दौरान मंदिर परिसर के समीप श्मशान भूमि में स्थित श्मशान देवी की भी विशेष पूजा होती है। परंपरा के अनुसार, पूजा में भुआ, पाठा, भेड़, केला, नारियल सहित विभिन्न सामग्री अर्पित की जाती है। श्रद्धालु इस अनुष्ठान को शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। नवरात्र में मंदिर परिसर में नौ दिनों तक व्रत और साधना करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। कई भक्त पूरे नौ दिनों तक फलाहार करते हैं, जबकि कुछ अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार निर्जला व्रत भी रखते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में अर्जी लगाने पर मनोकामना पूरी होती है।
मां नेतुला धाम में संतानसुख के लिए आते हैं भक्त:2600 साल पुराने इस धाम का जैन धर्म से भी है संबंध, नवरात्र में कठिन व्रत
