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पर नियमावली नहीं, काम अटका झारखंड के विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा की व्यवस्था बदलने के लिए नया कानून लागू कर दिया गया, लेकिन उसे जमीन पर उतारने वाले नियम-परिनियम अब तक नहीं बने हैं। झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 को 28 अप्रैल को लागू किया गया था। 27 अक्टूबर को इसके लागू होने के छह महीने पूरे हो जाएंगे। इसके बावजूद नियुक्ति, प्रोन्नति, सेवा शर्तों, प्रशासनिक निकायों और शिकायत निवारण की व्यवस्था को व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिए जरूरी परिनियम विश्वविद्यालयों को नहीं भेजे गए हैं। इससे नए कानून के प्रावधानों को लागू करने का रास्ता स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। पांच बड़ी समस्याएं, जिनका समाधान परिनियमों में 1 प्रोन्नति की प्रक्रिया: विश्वविद्यालयों में शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारी निर्धारित पात्रता पूरी करने के बाद प्रोन्नति के लिए आवेदन करते हैं। इसमें सेवा अवधि, शैक्षणिक उपलब्धियों, कार्य मूल्यांकन और अन्य मानकों की जांच होती है। नई व्यवस्था में इन प्रक्रियाओं को अधिनियम के अनुरूप चलाने के लिए स्पष्ट परिनियम जरूरी हैं। असर… निर्धारित सेवा अवधि पूरी करने के बाद प्रोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे शिक्षकों और कर्मचारियों के मामले प्रभावित हो सकते हैं। देरी से पदनाम, वेतनमान और करियर में प्रगति पर असर पड़ सकता है। 2 नई नियुक्तियां: नए अधिनियम में विश्वविद्यालयों के अफसरों, शिक्षकों व कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय सेवा आयोग की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य नियुक्तियों के लिए संस्थागत ढांचा तैयार करना है। हालांकि, आयोग के गठन के साथ उसके संचालन, अधिकार क्षेत्र, सदस्यों की नियुक्ति और चयन प्रक्रिया को भी स्पष्ट करना होगा। असर: शिक्षकों के 60% रिक्त पदों को भरना बुनियादी जरूरत है। पर्याप्त शिक्षक नहीं होने से कक्षाओं, शोध निर्देशन, विद्यार्थियों के मूल्यांकन और विभागीय गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। 3 सेवा शर्तें और स्थानांतरण: नया अधिनियम विश्वविद्यालयों के अधिकारियों, शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवा शर्तों से जुड़ी व्यवस्था में भी बदलाव करता है। इसके तहत राज्य सरकार को पद सृजन, वेतन निर्धारण, स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति जैसे विषयों पर अधिकार दिए गए हैं। इन प्रावधानों को लागू करने में परिनियमों की अहम भूमिका होगी। असर: नियुक्ति की प्रक्रिया, पदस्थापन, स्थानांतरण की परिस्थितियों और प्रतिनियुक्ति के लिए जरूरी अनुमति जैसे सवालों का जवाब परिनियमों से ही स्पष्ट होगा। 4 विश्वविद्यालयों के बोर्ड और समितियां : विश्वविद्यालयों के विभिन्न बोर्डों, समितियों और संस्थागत निकायों की संरचना और कार्यप्रणाली परिनियमों से स्पष्ट होगी। अधिनियम में प्रशासनिक, शैक्षणिक और वित्तीय अधिकारों से जुड़े प्रावधान हैं। इन्हें व्यवहार में लागू करने के लिए संबंधित परिनियम जरूरी हैं। असर: बोर्ड-समितियां शैक्षणिक नीतियों, पाठ्यक्रम, प्रशासनिक फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनके प्रभावी संचालन के लिए सदस्यों के चयन, बैठक बुलाने की प्रक्रिया और अधिकार स्पष्ट होने चाहिए। 5 शिकायतों का निपटारा : विश्वविद्यालयों में छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों की शिकायतों के निपटारे के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है। नए अधिनियम में शिकायत निवारण से जुड़ी समितियों और न्यायाधिकरण की व्यवस्था का प्रावधान है। इनके गठन और संचालन की प्रक्रिया स्पष्ट करने के लिए भी संबंधित परिनियमों की जरूरत होगी। असर: परिनियम नहीं होने से यह स्पष्ट नहीं होगा कि शिकायत कहां दर्ज कराई जाए, किस प्राधिकारी को उस पर विचार करने का अधिकार होगा, संबंधित पक्षों को पक्ष रखने का अवसर कैसे मिलेगा और शिकायत के निपटारे की समय-सीमा क्या होगी।
विश्वविद्यालयों में 6 माह पहले नियम लागू:नई नियुक्ति, प्रमोशन, सेवा शर्तों, प्रशासनिक निकायों और शिकायत निवारण की प्रक्रिया अबतक तय नहीं
