औरंगाबाद में भगवान राम के साथ होली खेलते भक्त:46 साल से चली आ रही है परंपरा; भव्य तरीके से राम विवाह उत्सव का आयोजन होगा

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बिहार- झारखंड की सीमा पर औरंगाबाद के नवीनगर प्रखंड के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध गजना धाम मंदिर परिसर है। यहां लगभग 46 साल से विशेष होली का आयोजन किया जाता है। विशेष होली इस बार भी पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाएगी। इसकी तैयारियां पूरी कर ली गई है। होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के साथ भक्तों के आत्मीय मिलन और धार्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है। गजना धाम परिसर में आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम इन दिनों एक बार फिर देखने को मिल रहा है। भगवान राम के होली खेलने की मान्यता मंदिर परिसर में 21 फरवरी से ही सीताराम नाम नवाह्न जप यज्ञ और श्री सीताराम विवाह उत्सव पूजन का भव्य आयोजन चल रहा है। जो 9 फरवरी तक चलेगा। 21 फरवरी से आरंभ हुआ नवाह्न जप यज्ञ 2 मार्च को पूर्णाहुति के साथ खत्म होगा। राम विवाह उत्सव की तैयारियां तेज हो जाती हैं। लेकिन इस पूरे धार्मिक अनुष्ठान का सबसे आकर्षक और विशेष क्षण होता है होली का आयोजन, जब भगवान राम स्वयं ग्रामीणों के साथ सात्विक होली खेलते हैं। लगभग 46 साल से चली आ रही है परंपरा लगभग 46 साल से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार 4 मार्च को होली के अवसर पर बिहार के नवीनगर प्रखंड और झारखंड के हुसैनाबाद प्रखंड के दर्जनों गांवों से हजारों श्रद्धालु गजना धाम पहुंचते हैं। भक्त भगवान श्रीराम को अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं और फिर आपस में प्रेम और सद्भाव के रंगों से सराबोर होते हैं। इस विशेष होली की खासियत यह है कि यहां केवल सात्विक और धार्मिक वातावरण में होली खेली जाती है। ढोल-नगाड़ों और भजन-कीर्तन के बीच वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस दिन भगवान राम के साथ होली खेलने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। होली के रंगों के साथ यहां भक्ति का रंग भी गहरा होता है। मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और प्रवचन का क्रम लगातार चलता रहता है, जिससे पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है। सीमा क्षेत्र में मनाई जाने वाली यह विशेष होली सामाजिक समरसता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक एकता का अनूठा उदाहरण है। बिहार और झारखंड के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ रंगों और भक्ति में डूब जाते हैं। 46 साल से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ जीवित है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत का संदेश देती है। होली के दूसरे दिन 5 मार्च को भगवान श्री राम का तिलोत्सव होली के दूसरे दिन 5 मार्च को तिलक समारोह आयोजित होगा। 6 मार्च को मंडप पूजन और किशोरी की हल्दी रस्म संपन्न की जाएगी। 7 मार्च को भगवान श्रीराम की भव्य बारात नगर भ्रमण के लिए निकलेगी, जो हर साल की तरह इस बार भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहेगी। पारंपरिक वेशभूषा और गाजे-बाजे के साथ सुसज्जित बारात झारखंड सीमा पर स्थित पोलडीह गांव पहुंचेगी, जहां ग्रामीण माता सीता के मायके वालों की भूमिका निभाते हैं। गांव को विशेष रूप से सजाया जाता है और बारात का पारंपरिक रीति-रिवाजों से भव्य स्वागत किया जाता है। 8 मार्च को धाम परिसर में सीताराम विवाह उत्सव विधि-विधान से संपन्न होगा। इसके अगले दिन 9 मार्च को श्रीराम कलेवा प्रसाद पूजन के साथ कार्यक्रम का समापन किया जाएगा। इस अवसर पर 56 प्रकार के भोगों का वितरण भक्तों के बीच किया जाएगा, जिसे पाने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटे हैं ग्रामीण यह संपूर्ण आयोजन श्री श्री 108 श्री महंत अवध बिहारी दास जी के सानिध्य में संपन्न हो रहा है। आयोजन समिति के अध्यक्ष यमुना प्रसाद सिंह, उपाध्याय भृगुनाथ सिंह, सचिव गुप्तेश्वर सिंह सहित कई सदस्य कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटे हैं। विवाह उत्सव में दशरथ की भूमिका में सुरेंद्र प्रसाद सिंह और जनक की भूमिका में भूगुनाथ सिंह उपस्थित रहेंगे। खुद प्रसाद बनाकर माता को समर्पित करते भक्त गजना धाम परिसर में स्थित गजानन माता का मंदिर भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। बिहार-झारखंड सीमा पर स्थित इस मंदिर में माता के निर्विकार स्वरूप की पूजा की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद यहां पूरी होती है। भक्त स्वयं मिट्टी के बर्तन में शुद्ध घी से पकवान बनाकर माता को अर्पित करते हैं।

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