Saturday, July 4, 2026

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लोहरदगा की ढेलामार होली…खूंटा छूने के लिए दौड़ लगाने वालों में गांव के नए दामाद िहस्सा लेते हैं

प्रसन्नजीत घोष | लोहरदगा सेन्हा प्रखंड के अंतर्गत बरही गांव में सौ वर्षों से ढेलामार होली की परंपरा चली आ रही है। इसमें ग्रामीणों के अलावा गांव के नए दामाद उत्साह के साथ िहस्सा लेते हैं। मान्यता है कि ढेले से बचकर या चोट खाकर जो खूंटा छूते हैं वह भाग्यवान होते हैं। उन्हें सुख शांति और सौभाग्य मिलता है। ऐसा मानना है कि जो खूंटे को छूने जाते हैं वह सत्य के प्रति आगे बढ़ते और पत्थर फेंकने वाले सत्य के लिए जाने जाते हैं। हरबार यह आयोजन होली के ठीक एक िदन पहले होता है। इसबार 3 मार्च को होगा। होली में तो कीचड़, कुरता फाड़, फूल वर्षा, लठमार जैसी परंपराएं मशहूर है। परंतु लोहरदगा के बरही की होली अनूठी परंपरा के लिए मशहूर है। यहां होली के दिन रंगोत्सव के बाद पूरे गांव के लोग अबीर खेलने के लिए ढोल, नगाड़ा, मांदर के साथ निकलते हैं और देवी मंडप के समीप मिलते हैं। जहां पर एक दिन पूर्व होलिका दहन किया गया था। अरंडी और शेमल के डाली को होलिका दहन के दिन जलाया जाता है। फगुवा कटने के बाद जो डाली जमीन में गड़ा रहता है। उसे उखाड़ने के लिए ही लोग अबीर के समय में देवी मंडप के समीप सभी जुटते हैं और उस आधे बचे हुए डाली को उखाड़ने के लिए गांव के लोग और नए दामाद दौड़ कर जाते हैं। पूरे गांव के लोग उनपर मिट्टी व कादो का ढेला चलाकर मारते हैं। परंतु किसी भी व्यक्ति को चोट नहीं लगता है। इस बीच सभी होरिबोल के नारे के साथ भागने वाले का उत्साह बढ़ाते है। पूरे आयोजन में गांव के लोग ही शामिल होते हैं, बाहर के लोग शामिल होने पर उन्हें गंभीर चोटें भी आ जाती है। आयोजन को देखने के लिए लोहरदगा के अलावा रांची, सिमडेगा, गुमला से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। परंतु कार्यक्रम में सिर्फ गांव के लोगों को ही भाग लेने की इजाजत होती है। खूटे को निकालने गई भीड़ पर ढेला बरसाते लोगों की फाइल फोटो। इस वर्ष भी गांव के प्रबुद्धजनों व पूर्व जिप सदस्य रामलखन साहू की अगुवाई में परंपरागत रूप से त्योहार आयोजित किया गया है। ढेला मार होली के साथ गांव में आने वाले नए दामादों को एक सम्मान भी दिया जाता है। समाज के बुद्धिजीवी लोगों द्वारा दामादों को पगड़ी और तौलिया देकर आदर के साथ होली पर्व मनाने में शामिल किया जाता है। पूरे आयोजन के बाद गांव के लोग पारंपरिक ढोल मांदर के साथ हर एक घर घूम कर बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद और छोटों का अबीर गुलाल लगाकर होली का बधाई देते हैं।

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