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रांची | आज का जीवन बाहर से भले ही उजला और सफल दिखाई दे, पर भीतर का मन अक्सर चुपचाप रोता है। जिम्मेदारियों का भार, टूटे सपनों की चुभन, रिश्तों की उलझन और भविष्य की चिंता हमें अंदर ही अंदर थका देती है। हम सबको संभालते-संभालते खुद बिखर जाते हैं। रात को जब सब सो जाते हैं, तब हमारा मन जागता रहता है -प्रश्नों, पछतावों और डर के साथ। ऐसे ही थके हुए मन के लिए चालीसा काल ईश्वर का कोमल निमंत्रण है-आओ, मेरे पास विश्राम पाओ। जब हम क्रूस को देखते हैं, तो याद आता है कि येसु मसीह ने भी दर्द, अस्वीकृति और अकेलेपन को सहा। वे हमारे दर्द को समझते हैं, क्योंकि वे स्वयं उस राह से गुजरे हैं। चालीसा काल हमें रुकना सिखाता है- थोड़ा कम बोलना, थोड़ा अधिक सुनना और मौन में प्रभु के सामने बैठ जाना। जब हम अपने आंसू छिपाना छोड़ देते हैं और सच्चे मन से कहते हैं, प्रभु, मैं थक गया हूं, तब भीतर एक गहरी शांति उतरती है। चालीसा काल विश्राम का द्वार है – उसे खोल दीजिए। प्रभु में ठहरिए, वहीं सच्ची शांति है। -सि. सबिना लकड़ा डी एस ए, संत अन्ना कान्वेंट मांडर
प्रभु में ठहरिए, वहीं सच्ची शांति है
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