सुपौल के कुमार आर्यन ‘एजुकेशन द टेरर’ में निभाया किरदार:मराठी फिल्म ‘एनीवे’ में सेकंड लीड रोल, युवाओं के लिए बने प्रेरणा

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सुपौल जिला अंतर्गत प्रतापगंज प्रखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले अभिनेता कुमार आर्यन आज युवाओं के लिए प्रेरणा बनते जा रहे हैं। बचपन से ही अभिनेता बनने का सपना देखने वाले इस सीधे-साधे लड़के ने सिर्फ ख्वाब नहीं देखे, बल्कि उन्हें साकार करने के लिए 15 वर्षों तक लगातार संघर्ष और कड़ी मेहनत की। अच्छे कद-काठी और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी कुमार आर्यन अपनी विनम्रता और सरल स्वभाव के लिए भी जाने जाते हैं। अभिनय के प्रति उनका जुनून ही उन्हें लगातार आगे बढ़ाता रहा। कठिन दौर, असफलताओं और लंबा इंतजार इन सबके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। यही जिद आज उनकी सफलता की असली वजह बन चुकी है। हिंदी फिल्म एजुकेशन द टेरर में उनके द्वारा निभाया गया ओपनिंग सीन इतना प्रभावशाली रहा कि वह पूरे किरदार पर भारी पड़ गया। कलाकारों के साथ कुमार आर्यन, देखें तस्वीरें… एनीवे में सेकंड लीड रोल में नजर आएंगे
इस उपलब्धि का श्रेय वे फिल्म के निर्देशक जितेंद्र जायस को देते हैं और उनके प्रति आभार जताते नहीं थकते। कुमार का मानना है कि एक कलाकार को निखारने में निर्देशक की भूमिका बेहद अहम होती है। अब कुमार आर्यन मराठी फिल्म इंडस्ट्री में भी अपनी छाप छोड़ने को तैयार हैं। हाल ही में उनकी मराठी फिल्म एनीवे की शूटिंग संपन्न हुई है, जिसमें वे सेकंड लीड रोल में नजर आएंगे। इस फिल्म की शूटिंग 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर शुरू हुई थी, जिसे कुमार अपने जीवन का शुभ संकेत मानते हैं। अलग अंदाज़ और प्रभावशाली लुक में दिखाई देंगे
फिल्म ‘एनीवे’ में कुमार आर्यन का किरदार ‘अकील अहमद’ का है, जो कहानी का एक महत्वपूर्ण पात्र है। इस भूमिका में वे बिल्कुल अलग अंदाज़ और प्रभावशाली लुक में दिखाई देंगे। खास बात यह रही कि फिल्म की स्क्रिप्ट में उनके संवादों को हिंदी में रूपांतरित किया गया, ताकि वे अपने किरदार को पूरी सहजता से निभा सकें। इसे वे अपने लिए बड़ी उपलब्धि और निर्देशक का विशेष स्नेह मानते हैं। 15 साल के संघर्ष के बाद मिली सफलता
कुमार आर्यन इस सफलता का श्रेय माता काली और भगवान महादेव की कृपा को देते हैं। उनका कहना है कि मराठी फिल्म में सेकंड लीड जैसा अहम रोल मिलना उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। वे बताते हैं कि फिल्म के निर्देशक चहान्दे दादा ने उन्हें बेटे की तरह स्नेह और सम्मान दिया। शूटिंग सेट पर वे उन्हें प्यार से “बिटुवा” कहकर बुलाते थे, जो उनके रिश्ते की आत्मीयता को दर्शाता है। कुमार की बातों से स्पष्ट है कि वे अपने लक्ष्य को लेकर बेहद गंभीर और समर्पित हैं। उनका मानना है कि कलाकार के लिए मेहनत, धैर्य और विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होती है। 15 साल के संघर्ष के बाद मिली यह सफलता उनकी कहानी को खास बनाती है। प्रतापगंज के इस बेटे की उड़ान अब और ऊंची होती नजर आ रही है। अपने जुनून, संघर्ष और सकारात्मक सोच के दम पर कुमार आर्यन आने वाले समय में फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा मुकाम हासिल कर सकते हैं।

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