दरभंगा में दिखी होली की धूम:बच्चों ने एक दूसरे को लगाया गुलाल, युवाओं ने खेली कीचड़ से होली; पूर्व मंत्री के घर लोगों ने गाए गीत

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पूरे देश में इन दिनों होली की धूम है। रंगों, उमंग और भाईचारे का यह पर्व हर साल फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस साल चंद्र ग्रहण के कारण कई जगहों पर होलिका दहन का मुहूर्त देर रात पड़ा, जबकि रंगों की होली अलग-अलग तिथियों पर मनाई जा रही है। दरभंगा में होली से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक खास परंपरा नई नवेली दुल्हन की पहली होली को लेकर भी है। शहर में कहीं लोगों ने आज कीचड़ से होली खेली तो कहीं बड़ों के पैरों पर अबीर-गुलाल लगाकर आशीर्वाद लिया है। बच्चों ने एक दूसरे को रंग लगाया। दूसरी ओर रेलवे स्टेशन खाली देखने को मिला। पूर्व मंत्री सह एमएलसी हरि साहनी के घर होली मिलन समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों भाजपा कार्यकर्ता जुटे। गीत संगीत का आयोजन किया गया। देश के कई हिस्सों, खासकर ग्रामीण इलाकों में, यह परंपरा आज भी निभाई जाती है कि विवाह के बाद नई दुल्हन अपनी पहली होली ससुराल में नहीं, बल्कि मायके में मनाती है।
गांव के बुजुर्गों के अनुसार, इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि जब होलिका अग्नि में बैठी थीं, तो अगले दिन उनका विवाह होना था। लेकिन अग्नि में दहन हो जाने के कारण उनका विवाह नहीं हो सका। कहा जाता है कि जब उनकी होने वाली सास बारात लेकर पहुंची, तो उसने चिता को जलते देखा। तभी से यह परंपरा शुरू हुई कि होली के समय नई बहू ससुराल में न रहे। एक अन्य मान्यता के अनुसार, पहली होली पर सास और बहू को एक साथ होलिका दहन नहीं देखना चाहिए। ऐसा करने से रिश्ते में खटास आ सकती है। इसलिए नवविवाहित बहू को कुछ दिन पहले ही मायके भेज दिया जाता है, जहां वह अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ यह पर्व मनाती है। परंपरा को निभाना हमारा फर्ज दरभंगा के जखरा गांव आई श्रेता कुमारी ने बताया कि, “जो परंपरा है, उसे निभाना हमारा फर्ज है। हमारे यहां पहली होली ससुराल में नहीं होती, इसलिए मायके आ गए हैं। बचपन जहां बीता, वहां की होली का मजा ही अलग होता है। बहनें और परिवार के लोग मिलकर खूब रंग खेलते हैं।” जुरौना से अपने ससुराल (जखरा) पहुंचे निलेश कुमार ने कहा कि, “ससुराल की होली के बारे में बहुत सुना था। शादी के बाद यह पहली होली है, इसलिए छुट्टी लेकर आए हैं। खूब रंग खेल रहे हैं, पकवान बन रहे हैं और साला-साली के साथ होली का अलग ही आनंद है।” श्रुति की मां चुनचुन देवी ने बताया कि, “परंपरा के अनुसार बेटी की पहली होली मायके में ही होती है। हमने समधन से कहकर बेटी और दामाद को बुलाया है। घर में पकवान बन रहे हैं और पूरे परिवार में खुशी का माहौल है।” हालांकि बदलते समय के साथ कई परिवारों में यह परंपरा अब वैकल्पिक हो गई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसे आज भी श्रद्धा और मान्यता के साथ निभाया जाता है।
होली जहां रंगों और खुशियों का पर्व है, वहीं यह परंपराओं और रिश्तों की मधुरता को भी संजोए रखने का अवसर देती है। नई दुल्हन की पहली होली मायके में मनाने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो आज भी समाज में जीवित है।

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