रांची3 घंटे पहले
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राज्य के स्थानीय निकायों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं सामने आई हैं। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की वार्षिक तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट में पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों में कुल 2928 करोड़ रुपए से अधिक की गड़बड़ियां उजागर हुई हैं।
वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सोमवार को विधानसभा में सीएजी की दो रिपोर्ट सदन के पटल पर रखीं। इनमें एक रिपोर्ट मार्च 2022 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष के लिए स्थानीय निकायों पर वार्षिक तकनीकी निरीक्षण प्रतिवेदन है, जबकि दूसरी रिपोर्ट मार्च 2023 तक की अवधि के लिए राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से संबंधित है। रिपोर्ट में स्थानीय निकायों में वित्तीय प्रबंधन, योजना निर्माण, लेखा प्रणाली और निगरानी तंत्र में गंभीर कमियां पाई गई हैं।
कई योजनाओं में बिना उचित प्रक्रिया के खर्च, अनुदान का उपयोग नहीं होना, उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित रहना और पंचायत भवनों के निर्माण में अनियमितताएं पाई गईं हैं। टेस्ट चेक ऑडिट में सामने आए मामलों का कुल वित्तीय प्रभाव 2928 करोड़ रुपए से अधिक बताया गया है। पंचायतों में ही 838 करोड़ रुपए की अनियमितताएं दर्ज की गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 से 2022 के बीच किए गए ऑडिट में 229 निरीक्षण प्रतिवेदनों में 2352 आपत्तियां दर्ज की गईं, जिनका वित्तीय प्रभाव 838 करोड़ रुपए है। -शेष पेज 9 पर
12 करोड़ का कॉलेज भवन बेकार
रिपोर्ट में योजना और तकनीकी आकलन की कमी के कई उदाहरण दिए गए हैं। एक डिग्री कॉलेज भवन हाई टेंशन लाइन के पास बना दिया गया, जिससे उसका उपयोग संभव नहीं रहा और करीब 12 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी भवन बेकार हो गया। इसी तरह झारखंड बालिका आवासीय विद्यालय की अधूरी संरचनाओं पर 5.60 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी भवन उपयोग में नहीं आ सका। झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय के स्थाई परिसर का निर्माण 2018 में शुरू हुआ था, जिसे 2020 तक पूरा होना था। लेकिन 12.10 करोड़ खर्च होने के बाद 2021 में काम बंद हो गया और भवन का ढांचा अधूरा पड़ा है। इसके अलावा स्वास्थ्य केंद्र, पर्यटन विकास और कोल्ड स्टोरेज से जुड़ी परियोजनाओं में 13.32 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी काम अधूरा रह गया।
पंचायत भवन निर्माण में भी अनियमितताएं: पश्चिमी सिंहभूम जिला परिषद ने राज्य सरकार की रोक के बावजूद पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि से 7 करोड़ रुपए खर्च कर 19 नए पंचायत भवन बनवा दिए। वहीं 4.17 करोड़ रुपए की राशि उपयोग किए बिना ही खातों में पड़ी रही।7592 करोड़ के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित: शहरी निकायों में वित्तीय स्थिति कमजोर मिली। मार्च 2022 तक 7592 करोड़ के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे। इसके अलावा 2006-07 से 2017-18 के बीच 40.78 करोड़ रुपए के आकस्मिक व्यय के बिल भी जमा नहीं हुए।
1500 पंचायतों में सामाजिक ऑडिट ही नहीं
ग्रामीण विकास विभाग के तहत सामाजिक ऑडिट इकाई ने वर्ष 2017-18 में 1500 ग्राम पंचायतों में सामाजिक ऑडिट किया था। लेकिन इसके बाद 2018-19 से 2021-22 के बीच सामाजिक ऑडिट की कोई योजना ही नहीं बनाई गई। इससे योजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठे हैं।
14वें वित्त आयोग के 258 करोड़ खर्च नहीं
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि राज्य सरकार 14वें वित्त आयोग के 258 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं कर सकी। इसके अलावा ग्राम पंचायतों को अनुदान जारी करने में 10 से 210 दिनों तक की देरी हुई। इस देरी के कारण पंचायतों को ब्याज भुगतान के रूप में 53 करोड़ रुपए की अतिरिक्त देनदारी उठानी पड़ी।
शहरी निकायों में 2091 करोड़ की गड़बड़ी: रिपोर्ट में शहरी स्थानीय निकायों की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है। ऑडिट में 431 मामलों में 2091 करोड़ रुपए की वित्तीय अनियमितताएं सामने आईं, जिनका अब तक निपटारा नहीं किया गया है।नियम नहीं बनने से 486 करोड़ का अनुदान नहीं मिला: पंचायतों के लिए कर वसूली से जुड़े नियम राज्य सरकार ने अब तक नहीं बनाए। इसके कारण झारखंड को 14वें वित्त आयोग के तहत 486 करोड़ रुपए का अनुदान नहीं मिल पाया।





