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सालाना दो करोड़ खर्च, पर अंधविश्वास हर साल ले रहा 18 बेगुनाहों की जान


हजारीबाग के विष्णुगढ़ में 12 साल की मासूम बच्ची की तंत्र-मंत्र के नाम पर हत्या कर दी गई। यह सिर्फ एक बच्ची की हत्या नहीं, बल्कि झारखंड का वह भयावह चेहरा है, जहां आज भी अंधविश्वास के नाम पर लगातार इंसानों की जान ली जा रही है। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता के तमाम दावों के बीच राज्य के कई हिस्सों में अंधविश्वास अब भी कानून और इंसानियत पर भारी है। इस घटना के बाद भास्कर ने पड़ताल की तो चौंकाने वाला सच सामने आया। पता चला कि पिछले चार साल में अंधविश्वास के नाम पर राज्य में 73 बेगुनाहों की हत्या कर दी गई। यानी हर साल औसतन 18 लोगों की जान सिर्फ इसलिए चली गई, क्योंकि समाज का एक हिस्सा आज भी टोना-टोटका और झाड़-फूंक को कानून से ऊपर मानता है। महिलाएं और बच्चे इनका आसान निशाना बन रहे हैं। गांवों में बीमारी, मौत या किसी अनहोनी के पीछे किसी को डायन ठहराना और फिर भीड़ द्वारा सजा देना आम बात बन चुकी है। कानून और जागरूकता अभियान के बावजूद जमीनी हकीकत नहीं बदल रही है। पश्चिमी सिंहभूम व गुमला में सबसे ज्यादा हत्या अंधविश्वास के कारण पिछले चार सालों में पश्चिमी सिंहभूम में सबसे ज्यादा 13 हत्याएं हुई हैं। गुमला में 9 लोगों की जान गई है। वहीं गढ़वा में 6 और दुमका व खूंटी में 5-5 हत्याएं हुई हैं। राजधानी रांची भी इससे अछूती नहीं है। यहां भी अंधविश्वास के कारण चार साल में सात लोगों की हत्या हो चुकी है। यह दिखाता है कि शहरी प्रभाव के बावजूद ग्रामीण सोच और सामाजिक दबाव हावी है। कानून का डर नहीं, क्योंकि सजा की दर महज 5% राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू होने के बावजूद अपराधी बेखौफ हैं। झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार इन मामलों में सजा की दर महज 5 प्रतिशत है। ग्रामीण इलाकों में सामाजिक दबाव इतना अधिक होता है कि गवाह कोर्ट पहुंचने से पहले ही मुकर जाते हैं। इसके कारण हत्यारे कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाकर साफ बच निकलते हैं। जानिए… चार ​साल में अंधविश्वास ने किस जिले में कितने लोगों की जान ली जिला-वार सांख्यिकी रिपोर्ट (2022-2025) (स्रोत : झारखंड पुलिस)
हजारीबाग में बच्ची की हत्या के बाद भास्कर की पड़ताल झारखंड सरकार अंधविश्वास और डायन-बिसाही जैसी कुप्रथा को खत्म करने के लिए सालाना करीब दो करोड़ रुपए का बजट आव​ंटित करती है। लेकिन इसका 60% हिस्सा शहरों व प्रखंड मुख्यालयों में नुक्कड़ नाटक और बैनर पर खर्च हो जाता है। सुदूर जंगल-पहाड़ वाले गांवों तक यह टीम पहुंचती ही नहीं। वहीं बजट की 25 प्रतिशत राशि मुआवजा और पुनर्वास के नाम पर खर्च किया जाता है।

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