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रामगढ़ में सरहुल महापर्व की धूम:10 हजार से अधिक लोगों की भागीदारी, प्रकृति पूजा के साथ गूंजा शहर


रामगढ़ में सरहुल महापर्व पारंपरिक श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस मौके पर दस हजार से अधिक प्रकृति प्रेमियों और आदिवासी समाज के लोगों की भागीदारी ने पूरे शहर को उत्सवमय बना दिया। कार्यक्रम की शुरुआत जिला मैदान से भव्य शोभायात्रा के साथ हुई। जिसमें पारंपरिक वेशभूषा में सजे महिला-पुरुष, बच्चे और बच्चियां ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य-गान करते नजर आए। शोभायात्रा चट्टी बाजार, गोलपार, थाना चौक होते हुए सुभाष चौक पहुंची, जहां यह एक विशाल सभा में तब्दील हो गई। साल वृक्ष की पूजा के साथ प्रकृति की आराधना सरहुल पर्व के मुख्य अनुष्ठान में पाहन द्वारा साल वृक्ष की पूजा की गई। सखुआ (साल) के फूलों के साथ की गई यह पूजा प्रकृति के प्रति आस्था और समर्पण का प्रतीक है। इस अवसर पर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की गई। जिले के बड़काकाना, पोचरा, छोटका खाना, पतरातू बस्ती, ब्लॉक चौक, टायर मोड़, पटेल चौक, घुटवा और नई सराय समेत विभिन्न क्षेत्रों में भी पारंपरिक रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना की गई। इन सभी स्थानों से लोग सुभाष चौक पहुंचे, जहां सरहुल समिति ने उनका स्वागत किया। झूमर नृत्य और झांकियों ने मोहा मन आदिवासी छात्र संघ रामगढ़ जिला के नेतृत्व में सरहुल महोत्सव सह मिलन समारोह का आयोजन किया गया। जिलाध्यक्ष सुनील मुंडा की अध्यक्षता में निकली शोभायात्रा में हजारों महिला-पुरुष, युवक-युवतियां शामिल हुए। शहर की मुख्य सड़कों पर पारंपरिक गीत-संगीत और झूमर नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। पतरातू बस्ती की झांकी में मां सरना और प्रकृति संरक्षण का संदेश प्रमुखता से दिखाया गया। जगह-जगह शोभायात्रा का स्वागत कर लोगों के बीच शरबत, चना और गुड़ का वितरण किया गया तथा पुष्प वर्षा कर अभिनंदन किया गया। सरहुल को बताया प्रकृति और संस्कृति का पर्व सुभाष चौक पर आयोजित मिलन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में दर्जा प्राप्त मंत्री फागू बेसरा सहित कई गणमान्य लोग शामिल हुए। वक्ताओं ने सरहुल को जल, जंगल और जमीन से जुड़ा पर्व बताते हुए इसे आदिवासी संस्कृति की पहचान बताया। उन्होंने कहा कि नृत्य, गीत और संगीत के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का संदेश पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता है। समारोह में विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और प्रशासनिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही। यह आयोजन रामगढ़ में सामुदायिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के प्रति गहरी आस्था का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा।

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