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'80 हजार कर्ज लेकर अबूधाबी से घर लौटा':वीडियो न बना सके,इसलिए मोबाइल से कैमरा निकाला, 2 महीने की सैलरी फंसी; मुजफ्फरपुर लौटे लड़कों की आपबीती


‘’80 हजार कर्ज लेकर अपने भाई के साथ अबूधाबी से लौटा हूं। हम दोनों भाई लगातार परिवार के संपर्क में थे। माता-पिता फोन पर कहते थे कि अगर पैसे न हो तो कहो, हम यहां से भेज देते हैं, लेकिन किसी तरह तुम लोग घर लौट आओ। हम दोनों भाई जिस कंपनी में काम करते थे, वहां हर दूसरे दिन मिसाइल और ड्रोन से अटैक होता था। धमाकों की आवाज सुनकर डर भी लगता था। कभी-कभी ऐसा लगता था कि पता नहीं माता-पिता से मुलाकात भी हो पाएगी या नहीं। जिस कंपनी में काम करते थे, वहां के अफसरों से हम दोनों भाई लगातार गुहार लगा रहे थे कि हमें हमारे घर भेज दीजिए। लेकिन कंपनी के अधिकारी कहते थे कि अभी फ्लाइट का किराया ज्यादा है, अभी थोड़ा इंतजार कर लो, जंग खत्म होगी तो भेज देंगे। लेकिन हमने वहां अपने एक दोस्त से कर्ज लिया और फ्लाइट का टिकट करवाकर घर आ गए। दो महीने की सैलरी भी अटक गई, एक महीने की सैलरी फ्लाइट के टिकट में ही चली गई।” मुजफ्फरपुर के मोतीपुर प्रखंड के कथैया गांव के रहने वाले रविंद्र यादव के बेटे 22 साल के लालूबाबू और 21 साल के रंजन कुमार महतो ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ये बातें कही। दरअसल, खाड़ी देशों में जंग से बिगड़े युद्ध से बिगड़े हालात के कारण बिहार के कामगार घर लौट रहे हैं। इसी कड़ी में मुजफ्फरपुर के मोतीपुर प्रखंड के रहने वाले पांच कामगार कर्ज लेकर अपने गांव कथैया लौट गए हैं। इनमें लालबाबू कुमार, रंजन कुमार, पंकज कुमार, अजय महतो और रामबाबू महतो शामिल हैं। लालबाबू अपने भाई और अन्य के साथ मुजफ्फरपुर लौटा है। लालबाबू, रंजन महतो आखिरी बार कब गांव आए थे? आबूधाबी में कब से काम कर रहे थे? दोनों भाइयों ने आपबीती में क्या बताया? मुजफ्फरपुर लौटे अन्य लड़कों ने क्या कहा? पढ़िए, पूरी रिपोर्ट। ‘6X8 के कमरे में दहशत में बैठकर घर लौटने का इंतजार कर रहे थे’ लालबाबू ने बताया कि हम दोनों भाई आबूधाबी में साल 2017 से काम कर रहे हैं और बीच-बीच में घर आते रहते हैं। हम दोनों भाई आखिरी बार नवंबर 2024 में आबूधाबी गए थे और अब 18 महीने बाद लौटे हैं। लालबाबू ने बताया कि जंग की वजह से आबूधाबी में हालात ठीक नहीं थे। ईरान की ओर से हर दूसरे दिन मिसाइल और ड्रोन से अटैक किया जा रहा था। हम दोनों भाइयों के अलावा 5 से 6 लड़के 6X8 के कमरे में बैठकर घर लौटने का इंतजार कर रहे थे। रंजन महतो ने बताया कि दिन में दो-दो बार माता-पिता से बातचीत होती थी। पापा तो हालातों को समझ रहे थे, लेकिन मां कभी-कभी इमोशनल हो जाती थी, कहती थी कि बेटा पैसे नहीं हैं तो कहो मैं कर्ज लेकर भेज देती हूं, लेकिन जितना जल्दी हो, तुम दोनों भाई घर लौट आओ। मुझे पैसा नहीं चाहिए, हम लोग जिस हाल में हैं, खुशी-खुशी रह लेंगे, तुम दोनों ही नहीं रहोगे तो हमारा बुढ़ापा कैसे कटेगा? ‘माता-पिता से मांग नहीं सकते थे पैसे’ लालबाबू ने बताया कि पैसे तो पास में नहीं थे, घर की हालत भी हमें पता थी, इसलिए माता-पिता से पैसे नहीं मांग सकते थे। एक दिन मैंने अपने रूम में रह रहे एक साथी से मदद मांगी और उससे कर्ज लेकर टिकट बुक कराया। फिर मंगलवार की रात करीब 9 बजे पटना एयरपोर्ट पर पहुंचे। लालबाबू ने बताया कि मैं अपने भाई रंजन और गांव के ही तीन अन्य लड़कों के साथ आबूधाबी के दास आईलैंड पर मौजूद एक कंपनी में इलेक्ट्रिशियन का काम करता था। हम लोग जिस कंपनी में काम कर रहे थे, वो आबूधाबी से लगभग 160 किमी उत्तर-पश्चिम में फारस की खाड़ी में स्थित है। कंपनी के अधिकारियों ने कहा- टिकट महंगा है, सस्ता होगा तब घर भेजेंगे लालबाबू ने बताया कि मैंने और अन्य तीन लड़कों ने जंग शुरू होने के बाद कई बार कंपनी के अधिकारियों से गुहार लगाई कि समय रहते हम लोगों को घर भेज दीजिए। पहले तो कंपनी के अधिकारियों ने कई बाहर बहाना बनाया, हर बार कहते थे कि फ्लाइट कैंसिल है, कभी कहते थे कि टिकट कराया था, लेकिन जंग की वजह से टिकट कैंसिल हो गया है। फिर आखिर में कहने लगे कि अभी फ्लाइट का टिकट महंगा है, सस्ता होगा तब घर भेजेंगे। लालबाबू ने बताया कि हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था। किसी तरह घर लौटना था, फिर रूम में ही रहने वाले एक साथी से 80 हजार रुपए कर्ज लिया। इसके बाद 40-40 हजार रुपए में अपना और अपने भाई रंजन का टिकट कराकर अपने घर लौटे। वीडियो न बना सकें, इसलिए मोबाइल के पीछे का कैमरा निकाला लालबाबू कुमार ने आबूधाबी के हालातों का जिक्र करते हुए बताया कि हम लोगों के मोबाइल को एक दिन कंपनी में जमा कराया गया। इसके बाद सभी के मोबाइल का पिछला कैमरा निकलवा दिया गया, ताकि हम लोग वीडियो बनाकर किसी को न तो भेज सके, न सोशल मीडिया पर अपलोड कर सके। उन्होंने बताया कि जंग शुरू होने के बाद हर दूसरे दिन आसमान में मिसाइल, रॉकेट और ड्रोन दिखाई देते थे। लालबाबू ने बताया कि मिसाइल आने से करीब दो मिनट पहले मोबाइल पर तेज वाइब्रेशन के साथ मिसाइल अटैक का अलर्ट आता था। अगर हमारा मोबाइल ऑफ होता था, तब भी ये अलर्ट आता था। अलर्ट मिलते ही सभी लोग कमरे से बाहर निकल जाते थे। कुछ देर बाद जब मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर दिया जाता, तो फिर मैसेज आता- “इट्स सेफ”। हालांकि हर बार दिल में डर बना रहता था। पता नहीं कब कौन सा मिसाइल, रॉकेट या ड्रोन जमीन पर गिर जाए। हालात ठीक हो जाएंगे, तो दोनों भाई दोबारा आबूधाबी जाएंगे रंजन ने बताया कि हमारा अनुभव तो खतरनाक रहा है, लेकिन इसके बावजूद जब हालात ठीक हो जाएंगे, हम दोनों भाई दोबारा आबूधाबी जाएंगे, क्योंकि वहां हम लोगों के लायक काम तो है ही, साथ ही आकर्षक सैलरी भी मिलती हैं, सुविधाएं भी बेहतर मिलती है। रंजन ने बताया कि जब तक हालात ठीक नहीं होते हैं, गांव में ही रहना है। उसने बताया कि मेरी शादी 20 अप्रैल को होनी है, शादी की तैयारी चल रही है। पकंज ने कहा- परिवार के दबाव में लिया घर लौटने का फैसला लालबाबू और रंजन के साथ कथैया गांव लौटे 24 साल के पंकज कुमार ने बताया कि अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जंग छिड़ने के बाद से मेरे घर से मुझे लगातार कॉल आ रहे थे कि घर लौट आओ, किसी तरह वहां से निकलो। परिवार वाले कह रहे थे कि हालात सुधरने के बाद फिर चले जाना, लेकिन अभी जान बचाना जरूरी है। इसी दबाव में उन्होंने खुद पैसे खर्च कर टिकट कराया और लौट आए। अब कहानी दीपू की, जो 8 अप्रैल को मुजफ्फरपुर लौटा इधर, कथैया गांव का ही रहने वाला दीपू पिछले 7 महीनों से अबू धाबी की एक निजी कंपनी (यूरो मैकेनिकल) में काम कर रहा था। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच कंपनी ने दीपू को एहतियातन छुट्टी देकर भारत वापस भेज दिया। घर लौटने के बाद परिवार में खुशी का माहौल है। दीपू के पिता पुलेंद्र सिंह गांव में खेती करते हैं। परिवार में दो बेटे और एक बेटी हैं। बड़ा बेटा दीपक गुजरात की एक टायर फैक्ट्री में काम करता है, जबकि छोटा बेटा दीपू विदेश में नौकरी कर रहा था। उनकी बड़ी बहन की शादी हो चुकी है। दीपू के पिता पुलेंद्र सिंह ने कहा कि जब बेटा घर नहीं पहुंचा था, तो न्यूज देख कर बहुत डर लगता था। बेटे को हमेशा कहते थे कि स्थिति खराब है, तो घर वापस जाओ। बेटा 2 साल के लिए गया था। लेकिन, हालत खराब आने के कारण वो पहले ही घर आ गया। अमेरिकी बेस कैंप में धमाके की आवाज हमारे कमरे तक गूंजी दैनिक भास्कर से बातचीत में दीपू ने बताया कि जब अमेरिका-ईरान के बीच तनाव चरम पर था, तब काफी डर का माहौल था। दीपू कहता है कि “जहां पर हम रहते थे, वहां से करीब 6 किलोमीटर दूर अमेरिकी बेस कैंप था। एक बार वहां धमाका हुआ, जिसकी तेज आवाज हमारे कमरे तक सुनाई दी। उस वक्त हम लोग घर पर थे, लेकिन उस आवाज ने सभी को डरा दिया। दिन के समय ही हमला हुआ था। दीपू ने आगे बताया कि उनके रहने की जगह पर लगभग 500 से 600 लोग एक साथ काम करते थे। हमला होने के बाद आसपास के क्षेत्रों में रह रहे लोगों के मोबाइल पर अलर्ट आ जाता था। कहीं भी अब फ्लाइट से जाने में दिक्कत है। हर जगह का टिकट मंहगा हो चुका है। सभी कर्मियों को कंपनी ने दी छुट्टी, आने का खर्च भी दिया दीपू ने कहा कि फिलहाल कंपनी ने सभी कर्मचारियों को छुट्टी दे दी है और निर्देश दिया है कि स्थिति सामान्य होने तक अपने-अपने घर पर ही रहें। दीपू ने बताया कि 6 अप्रैल को वे अबू धाबी से फ्लाइट पकड़कर पहले 7 अप्रैल को अहमदाबाद पहुंचे, फिर वहां से दिल्ली और अंत में पटना आए। 8 अप्रैल को रात में मुजफ्फरपुर पहुंचे। यात्रा का पूरा खर्च कंपनी ने उठाया। घर पहुंचने पर बहुत खुशी हो रही है। खतरे से बाहर आने पर बहुत अच्छा लगता है। दीपू के सुरक्षित घर लौटने से परिवार ने राहत की सांस ली है, वहीं गांव में भी इसे लेकर चर्चा का माहौल है।

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