झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) में भाषा को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए गठित पांच मंत्रियों की विशेष कमेटी की पहली बैठक सोमवार को संपन्न हुई। बैठक में सभी सदस्यों ने अपने-अपने तर्क और तथ्यों के साथ पक्ष रखा, लेकिन किसी ठोस निष्कर्ष पर सहमति नहीं बन सकी। बैठक से पहले कमेटी के समन्वयक सह वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कार्मिक विभाग से आवश्यक जानकारियां मांगी थीं, लेकिन विभाग की ओर से स्पष्ट और संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका। इस पर कमेटी ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अगली बैठक से पहले पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराई जाए। भाषाओं को शामिल करने पर जोर कमेटी का मुख्य उद्देश्य भाषा विवाद को जल्द समाप्त करना है, ताकि अभ्यर्थियों के हित में निर्णय लिया जा सके। बैठक में यह बात सामने आई कि इस वर्ष की परीक्षा में अंगिका, भोजपुरी और मगही भाषाओं को शामिल करने पर सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी। सूत्रों के अनुसार, कमेटी चाहती है कि उसका निर्णय जल्द कैबिनेट में भेजा जाए और उस पर मुहर लग सके। संभावना जताई जा रही है कि कमेटी की अगली बैठक शुक्रवार को आयोजित की जाएगी, जिसमें इस मुद्दे पर आगे की दिशा तय की जाएगी। जनगणना के आंकड़ों पर उठे सवाल बैठक में कार्मिक विभाग द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों पर भी सवाल खड़े किए गए। जानकारी के मुताबिक, 2011 की जनगणना के आधार पर भोजपुरी और मगही बोलने वालों की संख्या मांगी गई थी। जो आंकड़े सामने आए, उसमें इन भाषाओं को बोलने वालों की संख्या उड़िया और बांग्ला भाषियों से चार गुना अधिक बताई गई। ऐसे में सदस्यों ने सवाल उठाया कि जब इन भाषाओं का दायरा इतना व्यापक है, तो इन्हें परीक्षा से बाहर क्यों किया गया। वहीं, नई नियमावली में कुरमाली भाषा को संथाल परगना के जिलों में शामिल नहीं करने पर भी आपत्ति जताई गई, जबकि वहां इसे बोलने वालों की संख्या तीन लाख से अधिक है। मैथिली दूसरी राजभाषा, इसे भी करें शामिल बैठक में यह मुद्दा भी जोर-शोर से उठा कि केवल क्षेत्रीय भाषाओं ही नहीं, बल्कि असुर, बिरहोर और मालतो जैसी जनजातीय भाषाओं को भी सूची से बाहर कर दिया गया है। सदस्यों ने इसे गंभीर विषय बताते हुए कहा कि इससे यह संदेश जाता है कि इन भाषाओं का अस्तित्व खत्म हो रहा है। साथ ही यह भी सुझाव दिया गया कि मैथिली, जो राज्य की दूसरी राजभाषा है, उसे भी क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। बैठक में सभी मंत्रियों ने अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए, वहीं मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने दस्तावेजों के साथ अपना पक्ष रखा। उन्होंने राधाकृष्ण किशोर और सीएम हेमंत सोरेन को दस्तावेज दिए हैं।
JTET भाषा विवाद; पहली बैठक में नहीं निकला कोई हल:बांग्ला-उड़िया से ज्यादा मगही, अंगिका, भोजपुरी बोलने वाले, फिर लिस्ट से गायब क्यों
झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) में भाषा को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए गठित पांच मंत्रियों की विशेष कमेटी की पहली बैठक सोमवार को संपन्न हुई। बैठक में सभी सदस्यों ने अपने-अपने तर्क और तथ्यों के साथ पक्ष रखा, लेकिन किसी ठोस निष्कर्ष पर सहमति नहीं बन सकी। बैठक से पहले कमेटी के समन्वयक सह वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कार्मिक विभाग से आवश्यक जानकारियां मांगी थीं, लेकिन विभाग की ओर से स्पष्ट और संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका। इस पर कमेटी ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अगली बैठक से पहले पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराई जाए। भाषाओं को शामिल करने पर जोर कमेटी का मुख्य उद्देश्य भाषा विवाद को जल्द समाप्त करना है, ताकि अभ्यर्थियों के हित में निर्णय लिया जा सके। बैठक में यह बात सामने आई कि इस वर्ष की परीक्षा में अंगिका, भोजपुरी और मगही भाषाओं को शामिल करने पर सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी। सूत्रों के अनुसार, कमेटी चाहती है कि उसका निर्णय जल्द कैबिनेट में भेजा जाए और उस पर मुहर लग सके। संभावना जताई जा रही है कि कमेटी की अगली बैठक शुक्रवार को आयोजित की जाएगी, जिसमें इस मुद्दे पर आगे की दिशा तय की जाएगी। जनगणना के आंकड़ों पर उठे सवाल बैठक में कार्मिक विभाग द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों पर भी सवाल खड़े किए गए। जानकारी के मुताबिक, 2011 की जनगणना के आधार पर भोजपुरी और मगही बोलने वालों की संख्या मांगी गई थी। जो आंकड़े सामने आए, उसमें इन भाषाओं को बोलने वालों की संख्या उड़िया और बांग्ला भाषियों से चार गुना अधिक बताई गई। ऐसे में सदस्यों ने सवाल उठाया कि जब इन भाषाओं का दायरा इतना व्यापक है, तो इन्हें परीक्षा से बाहर क्यों किया गया। वहीं, नई नियमावली में कुरमाली भाषा को संथाल परगना के जिलों में शामिल नहीं करने पर भी आपत्ति जताई गई, जबकि वहां इसे बोलने वालों की संख्या तीन लाख से अधिक है। मैथिली दूसरी राजभाषा, इसे भी करें शामिल बैठक में यह मुद्दा भी जोर-शोर से उठा कि केवल क्षेत्रीय भाषाओं ही नहीं, बल्कि असुर, बिरहोर और मालतो जैसी जनजातीय भाषाओं को भी सूची से बाहर कर दिया गया है। सदस्यों ने इसे गंभीर विषय बताते हुए कहा कि इससे यह संदेश जाता है कि इन भाषाओं का अस्तित्व खत्म हो रहा है। साथ ही यह भी सुझाव दिया गया कि मैथिली, जो राज्य की दूसरी राजभाषा है, उसे भी क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। बैठक में सभी मंत्रियों ने अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए, वहीं मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने दस्तावेजों के साथ अपना पक्ष रखा। उन्होंने राधाकृष्ण किशोर और सीएम हेमंत सोरेन को दस्तावेज दिए हैं।

