कोल्हान और सारंडा जंगलों में कभी नक्सलियों की बंदूकें कानून लिखती थीं। सुरक्षा बल के जवान कदम-कदम पर बारूदी सुरंगों के डर के साए में चलते थे। उस सारंडा जंगल के लाल आतंक ने घुटने टेक दिए हैं। झारखंड पुलिस, कोबरा और झारखंड जगुआर के बढ़ते दबाव के कारण 25 नक्सलियों और जेजेएमपी के दो उग्रवादियों ने गुरुवार को पुलिस मुख्यालय रांची में सरेंडर कर दिया। सरेंडर करने वाले नक्सलियों में छह सब जोनल कमांडर, छह एरिया कमांडर और 13 दस्ते के सदस्य हैं। इन्होंने 16 हथियार ओर 2857 गोलियां भी पुलिस को सौंपे। वहीं जेजेएमपी उग्रवादियों ने एक हथियार और 130 गोलियां पुलिस को सौंपे। सरेंडर करने वालों में माओवादी केंद्रीय कमेटी के सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ सागर जी और असीम मंडल दस्ते के शीर्ष कमांडर और सदस्य शामिल हैं, जिन्हें सारंडा के चप्पे-चप्पे की जानकारी थी। डीजीपी के निर्देशन में चलाए जा रहे ऑपरेशन नवजीवन और सरकार की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर इन नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़ा है।
इन नक्सलियों ने डाले हथियार, पांच लाख के इनामी सब जोनल कमांडर
सांगेन आंगरिया उर्फ दोकोल – 123 केस गांदी मुंडा उर्फ गुलशन – 48 केस नागेंद्र मुंडा उर्फ प्रभात मुंडा – 38 केस रेखा मुंडा उर्फ जयंती – 18 केस सुलेमान हासंदा उर्फ सुनो हासंदा – 13 केस 2 लाख का इनामी एरिया कमांडर करण उर्फ डांगुर – 29 केस। 17 हथियार और 2987 गोलियां भी सौंपीं सब जोनल कमांडर गांदी की भास्कर से बातचीतभूखे मरने की नौबत आ गई थी, सरेंडर न करते तो मारे जाते सब जोनल कमांडर गांदी ने भास्कर से बातचीत में कहा कि सुरक्षा बलों की लगातार घेराबंदी के कारण रसद की सप्लाई लाइन कट गई थी। भूखे मरने के कगार पर थे। वहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा है। सरेंडर नही करते तो मारा जाना तय था। इसलिए सरेंडर का फैसला लिया। उसके घर में दो भाई और माता-पिता हैं। अब उसके लिए जीना चाहता है। उसने बताया कि सुरक्षा बलों के आक्रामक चक्रव्यूह का खौफ ऐसा था कि कई नक्सलियों ने तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जाकर सरेंडर कर दिया। उसने संगठन में युवाओं के शोषण का भी खुलासा किया। गांदी ने बताया कि संगठन के शीर्ष नेता युवाओं का सिर्फ ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं। दस्ते में किसी नक्सली को एक पैसा नहीं मिलता, सिर्फ शोषण होता है। एक करोड़ रुपए का इनामी नक्सली मिसिर बेसरा सारंडा के जंगल में तानाशाह बना बैठा है। लेकिन उसका गढ़ ताश के पत्तों की तरह बिखर गया है। जब सुरक्षा बलों ने घेराबंदी की तो लगा कि अब नहीं भागे तो मरना तय है। कमांडर घायल हुआ तो किया सरेंडर, इसी ने खोला पुलिस का रास्ता सांगने आंगरिया उर्फ दोकोल मिसिर बेसरा व असीम मंडल की टीम का सबसे प्रमुख मोहरा रहा है। उसने चाईबासा इलाके में खूनी तांडव मचा रखा था। उसे घेरने के लिए सुरक्षा बलों ने 21 नए एडवांस कैंप लोकेशन और फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस कैंप स्थापित किए। इससे ग्रामीणों में सुरक्षा बलों के प्रति विश्वास जगा और नक्सलियों का मूवमेंट रुक गया। नक्सली गांवों से रसद लाते थे, लेकिन अब उनका निकलना मुश्किल हो गया। इससे नक्सली बौखला गए। इसी बीच सुरक्षा बलों और नक्सलियों में मुठभेड़ हो गई। सांगेन आंगरिया को गोली लगी। वह घायल हो गया। इसके बाद 15 मई को ही उसने सरेंडर कर दिया। क्योंकि वह जान गया था कि सरेंडर नहीं किया तो मरना तय है। सांगेन का पुलिस अपनी सुरक्षा में इलाज करा रही थी। उसके सरेंडर करने के बाद अन्य नक्सलियों ने भी सरेंडर का मन बनाया। फिर पुलिस से संपर्क साधा गया। आखिरकार गुरुवार को इन सबने सरेंडर कर दिया।


