भागलपुर में 25 और 26 मई को आंधी-तूफान और बारिश हुई। इसने केवल पेड़-पौधों, बिजली व्यवस्था और जनजीवन को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि पक्षी को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। शहर के झौवाकोठी और खिरनीघाट क्षेत्र में हजारों पक्षियों की मौत की आशंका जताई जा रही है। मृत पक्षियों में एशियन कोयल, गंगा मैना, बैंक मैना समेत मैना की कई प्रजातियां शामिल हैं। स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और वन विभाग की टीमों ने सैकड़ों मृत और घायल पक्षियों को विभिन्न स्थानों से उठाया है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि यह आंकड़ा केवल दो इलाकों का है, जबकि पूरे जिले में पक्षियों की मौत का आंकड़ा कहीं अधिक हो सकती है। तेज हवाओं, पेड़ों के गिरने और घोंसलों के नष्ट होने से पक्षियों पर भारी संकट आया है। शिक्षिका सह पर्यावरण सुरक्षा संरक्षक कंचन कुमारी ने बताया कि उनके अनुमान के अनुसार 2 हजार पक्षियों की मौत हुई होगी। उन्होंने कहा कि वन विभाग की टीम करीब 500 से 600 पक्षियों को उठाकर ले गई, जबकि उनकी टीम ने भी लगभग 100 घायल पक्षियों का रेस्क्यू किया, जिनमें से कई बाद में मर गए। गंगा घाट सहित कई क्षेत्रों में मृत पक्षी बिखरे पड़े थे। कंचन कुमारी के अनुसार इस घटना से पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंची है, क्योंकि प्रत्येक पक्षी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। जिले में हजारों पेड़ धराशायी हो गए हैं और बरगद व पीपल जैसे विशाल वृक्ष भी जड़ से उखड़ गए, जो इस तूफान की भयावहता को दर्शाता है। उन्होंने वन विभाग की तत्परता की भी सराहना करते हुए कहा कि सूचना मिलते ही विभाग की टीम मौके पर पहुंची और राहत कार्य शुरू किया। बिजली के खंभों और भवनों से टकरा जाते पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार आंधी-तूफान के दौरान पक्षियों की मौत कई कारणों से होती है। तेज हवाओं के कारण उड़ान के दौरान पक्षी पेड़ों, बिजली के खंभों और भवनों से टकरा जाते हैं। कई पक्षी पेड़ों के गिरने से घोंसलों समेत दब जाते हैं, जबकि अंडे और नवजात बच्चे भी नष्ट हो जाते हैं। लगातार बारिश और ठंडे मौसम के कारण घायल पक्षियों की मृत्यु हो सकती है। इसके अलावा तेज हवा से दिशा भ्रमित होने और आश्रय स्थलों के नष्ट होने से भी बड़ी संख्या में पक्षियों की जान जाती है। पर्यावरणविदों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं स्थानीय जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती हैं।
भागलपुर में आंधी-बारिश से 2 हजार पक्षियों की मौत:पेड़-पौधे पर बैठे चिड़ियों की गई जान, टीचर बोली- वन विभाग की टीम 600 पक्षी को ले गई
भागलपुर में 25 और 26 मई को आंधी-तूफान और बारिश हुई। इसने केवल पेड़-पौधों, बिजली व्यवस्था और जनजीवन को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि पक्षी को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। शहर के झौवाकोठी और खिरनीघाट क्षेत्र में हजारों पक्षियों की मौत की आशंका जताई जा रही है। मृत पक्षियों में एशियन कोयल, गंगा मैना, बैंक मैना समेत मैना की कई प्रजातियां शामिल हैं। स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और वन विभाग की टीमों ने सैकड़ों मृत और घायल पक्षियों को विभिन्न स्थानों से उठाया है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि यह आंकड़ा केवल दो इलाकों का है, जबकि पूरे जिले में पक्षियों की मौत का आंकड़ा कहीं अधिक हो सकती है। तेज हवाओं, पेड़ों के गिरने और घोंसलों के नष्ट होने से पक्षियों पर भारी संकट आया है। शिक्षिका सह पर्यावरण सुरक्षा संरक्षक कंचन कुमारी ने बताया कि उनके अनुमान के अनुसार 2 हजार पक्षियों की मौत हुई होगी। उन्होंने कहा कि वन विभाग की टीम करीब 500 से 600 पक्षियों को उठाकर ले गई, जबकि उनकी टीम ने भी लगभग 100 घायल पक्षियों का रेस्क्यू किया, जिनमें से कई बाद में मर गए। गंगा घाट सहित कई क्षेत्रों में मृत पक्षी बिखरे पड़े थे। कंचन कुमारी के अनुसार इस घटना से पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंची है, क्योंकि प्रत्येक पक्षी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। जिले में हजारों पेड़ धराशायी हो गए हैं और बरगद व पीपल जैसे विशाल वृक्ष भी जड़ से उखड़ गए, जो इस तूफान की भयावहता को दर्शाता है। उन्होंने वन विभाग की तत्परता की भी सराहना करते हुए कहा कि सूचना मिलते ही विभाग की टीम मौके पर पहुंची और राहत कार्य शुरू किया। बिजली के खंभों और भवनों से टकरा जाते पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार आंधी-तूफान के दौरान पक्षियों की मौत कई कारणों से होती है। तेज हवाओं के कारण उड़ान के दौरान पक्षी पेड़ों, बिजली के खंभों और भवनों से टकरा जाते हैं। कई पक्षी पेड़ों के गिरने से घोंसलों समेत दब जाते हैं, जबकि अंडे और नवजात बच्चे भी नष्ट हो जाते हैं। लगातार बारिश और ठंडे मौसम के कारण घायल पक्षियों की मृत्यु हो सकती है। इसके अलावा तेज हवा से दिशा भ्रमित होने और आश्रय स्थलों के नष्ट होने से भी बड़ी संख्या में पक्षियों की जान जाती है। पर्यावरणविदों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं स्थानीय जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती हैं।

