Friday, May 29, 2026

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भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े 900 नाडेप टैंक ढहने लगीं दीवारें, बिना जांच भुगतान


भास्कर ब्यूरो टीम | लातेहार ​जिला पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की देखरेख में स्वच्छता के नाम पर सरकारी राशि की बंदरबांट का बड़ा मामला सामने आया है। जिले के 754 में से 493 गांवों में कचरे से जैविक खाद बनाने के लिए वित्तीय वर्ष 2023-24 में लगभग 900 नाडेप टैंकों का निर्माण कराया गया था। लेकिन घटिया निर्माण सामग्री और प्रशासनिक अनदेखी के कारण करीब 30 प्रतिशत नाडेप टैंकों में दरारें आ गई हैं। जो 10 प्रतिशत टैंक खड़े हैं, उनमें कई जगह नाडेप की एक तरफ की, तो कहीं-कहीं दो तरफ की दीवारें गिर गई हैं। एक-दो जगहों पर यह पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। इससे इसकी उपयोगिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। विभाग ने यह कार्य सीधे कराने के बजाय स्थानीय मुखिया और जल सहिया के माध्यम से कराया था। जानकारी के अनुसार एक नाडेप टैंक के निर्माण पर लगभग ₹19,500 की राशि खर्च की गई थी। इस लिहाज से जिलेभर में इसके निर्माण में करीब ₹1.75 करोड़ खर्च किए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि बिना किसी स्थलीय सत्यापन और तकनीकी जांच के विभाग ने योजना की पूरी राशि का भुगतान भी कर दिया है। इस संबंध में सुरेंद्र पासवान, मनोज भुइयां, सतेंद्र प्रसाद समेत अन्य ग्रामीणों का आरोप है कि नाडेप निर्माण में घटिया ईंट और बालू-सीमेंट के खराब अनुपात का इस्तेमाल किया गया। इससे कई जगह टैंकों की दीवारें ढह गईं। कई जगह दरारें साफ देखी जा सकती हैं। ऐसे में स्वच्छ गांव-समृद्ध गांव वाली योजना पर पानी फिर गया है। ^नाडेप का निर्माण संबंधित पंचायत के मुखिया और जल सहिया के माध्यम से कराया गया है। यदि ऐसा है, तो योजना की जांच कराकर उसकी मरम्मत कराई जाएगी। उपयोगिता प्रमाण पत्र मिलने के बाद ही राशि का भुगतान किया गया है।^ दीपक कुमार महतो, ईई, लातेहार। नाडेप ईंटों से बनी पक्की टंकी होती है। इसमें हवा और नमी के आवागमन के लिए दीवार में कुछ जगह छोड़ी जाती है। इसमें घरों से निकलने वाले गीले कचरे (जैसे-सब्जी के छिलके, सड़े हुए फल, पत्तियां, खरपतवार आदि) और गोबर को परतों में भरकर खाद बनाया जाता है। एसबीएम (ग्रामीण) के तहत गांवों को साफ-सुथरा रखने के लिए ठोस और तरल कचरा प्रबंधन (एसएलडबल्यूएम) बेहद महत्वपूर्ण है। नाडेप गीले कचरे को इधर-उधर फेंकने या सड़ाने के बजाय सीधे उपयोगी खाद में बदल देता है। खुले में पड़े कचरे से दुर्गंध आती है। मच्छर-मक्खियां पनपती हैं। इससे बीमारियां फैलती हैं। नाडेप के उपयोग से गांव का वातावरण स्वच्छ और रोग-मुक्त रहता है।

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