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बिहार में पूर्ण शराबबंदी का दावा कागजों पर भले ही मजबूत हो, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। 29 मई को जारी राष्ट्रीय फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (एनएफएचएस-6) की रिपोर्ट ने राज्य के सामाजिक और स्वास्थ्य ढांचे की पोल खोल कर रख दी है।
रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि बिहार में पाबंदी के बावजूद शराब पीने वालों की तादाद घटने के बजाय बढ़ गई है। अब राज्य में 15 से 65 साल की उम्र के 16.5 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन कर रहे हैं, जबकि पिछले सर्वे (एनएफएचएस-5) में यह आंकड़ा 15.4 प्रतिशत था। यानी कानूनन सख्ती के बाद भी पीने वालों की संख्या में 1.1 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
इस रिपोर्ट का सबसे काला पहलू यह है कि शराब का नशा शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में ज्यादा पैर पसार चुका है। गांवों में 15 वर्ष से ऊपर के 17.1 प्रतिशत पुरुष शराब पी रहे हैं, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 12.8 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध शराब की आसान पहुंच, स्थानीय स्तर पर बनने वाली ‘चुलाई’ और पुलिसिया निगरानी की कमी को इसकी मुख्य वजह माना जा रहा है।
प्रशासन के तमाम दावों के बीच गांवों में शराब की यह उपलब्धता व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। स्वास्थ्य के मोर्चे पर बिहार ने संस्थागत प्रसव (अस्पतालों में जन्म) में सुधार किया है, जो 76.2% से बढ़कर 81.1% हो गया है। लेकिन यहां भी एक बड़ा ‘खेल’ उजागर हुआ है।
राज्य में सिजेरियन डिलीवरी (ऑपरेशन) की दर 13.2% तक पहुंच गई है। सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव मात्र 2.7% हैं, जबकि निजी अस्पतालों में आंकड़ा डराने वाला है। प्राइवेट अस्पतालों में 49.3 प्रतिशत प्रसव ऑपरेशन के जरिए हो रहे हैं। यानी निजी सेंटर्स में होने वाली हर दूसरी डिलीवरी ऑपरेशन से हो रही है।
घर की चहारदीवारी में बढ़ी हिंसा, रूह कंपा रहे आंकड़े
शराब के बढ़ते चलन का सीधा असर बिहार की ‘आधी आबादी’ पर पड़ रहा है। राज्य में जेंडर आधारित हिंसा में 0.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आंकड़े बताते हैं कि 18 से 29 साल की युवतियां सबसे ज्यादा हिंसा का शिकार हो रही हैं। विडंबना यह है कि गांवों के मुकाबले शहरी क्षेत्रों की महिलाएं (2.1%) इस हिंसा की ज्यादा शिकार हैं। सबसे दर्दनाक तथ्य यह है कि 18 से 49 वर्ष की 5.4 प्रतिशत विवाहित महिलाएं अपनी गर्भावस्था के दौरान भी हिंसा का शिकार हुई हैं। ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी का कहना है कि बिना प्रशासनिक मिलीभगत के शराब गांवों तक नहीं पहुंच सकती।
कागजी सख्ती व जमीनी मिलीभगत का नतीजा
बिहार में शराबबंदी के बावजूद पीने वालों की संख्या बढ़ना साफ करता है कि सिस्टम में कहीं बड़ा छेद है। ग्रामीण इलाकों में निगरानी की कमी और तस्करी के नेटवर्क ने शराबबंदी को मजाक बना दिया है। वहीं, निजी अस्पतालों में बढ़ते सिजेरियन केस बताते हैं कि स्वास्थ्य सेवा अब सेवा कम और मुनाफाखोरी का जरिया ज्यादा बन गई है। सरकारी नियंत्रण के बिना ये आंकड़े भविष्य में और भी भयावह हो सकते हैं।


