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वैशाली में बेटियों ने निभाया पुत्र धर्म, पिता की अर्थी को कंधा देकर पेश की मिसाल

वैशाली में बेटियों ने निभाया पुत्र धर्म, पिता की अर्थी को कंधा देकर पेश की मिसाल

Bihar News: (दीपक कुमार श्रीवास्तव की रिपोर्ट) वैशाली प्रखंड क्षेत्र के नया टोला गांव में मंगलवार को ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया. गांव निवासी 79 वर्षीय तारनी प्रसाद सिंह के निधन के बाद उनकी पांचों बेटियां पिता की अंतिम यात्रा में आगे आईं. बेटियों ने खुद अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया और पूरे सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी. यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं.

बेटियों ने निभाया फर्ज

स्वर्गीय तारनी प्रसाद सिंह के परिवार में कोई पुत्र नहीं था. उनकी पत्नी ललिता देवी और पांच बेटियां ही परिवार का सहारा हैं. पिता के निधन के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. लेकिन इस कठिन समय में बेटियों ने हिम्मत नहीं हारी.बड़ी बेटी पूनम सिंह, नीलम सिंह, माधुरी, माला और चांदनी ने मिलकर अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी संभाली.

अर्थी को कंधा देकर दिया बड़ा संदेश

अक्सर समाज में अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी बेटों से जोड़ी जाती है. लेकिन वैशाली की इन बेटियों ने पुरानी सोच को पीछे छोड़ते हुए यह साबित कर दिया कि बेटियां भी हर जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हैं. पिता की अंतिम यात्रा के दौरान पांचों बेटियां खुद आगे बढ़ीं और अर्थी को कंधा देकर समाज को एक सकारात्मक संदेश दिया.

ग्रामीण भी हुए भावुक

यह दृश्य देखकर गांव के लोग और रिश्तेदार भावुक हो उठे. ग्रामीणों ने कहा कि बेटियों ने जिस साहस और सम्मान के साथ अपने पिता को अंतिम विदाई दी, वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा है. लोगों का कहना था कि बेटियां केवल परिवार की जिम्मेदारी ही नहीं निभातीं, बल्कि हर परिस्थिति में मजबूत सहारा बनकर खड़ी रहती हैं.

नाती ने दी मुखाग्नि

अंतिम संस्कार के दौरान स्वर्गीय तारनी प्रसाद सिंह के नाती ने मुखाग्नि दी. पूरे विधि-विधान और धार्मिक परंपराओं के साथ अंतिम संस्कार संपन्न हुआ. इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण और शुभचिंतक मौजूद रहे.

समाज के लिए बना प्रेरणादायक उदाहरण

स्थानीय लोगों गुड्डू सिंह, गौरी सिंह, मंटून सिंह, रवि सिंह, मुन्ना सिंह और उमेश सिंह ने कहा कि बदलते समय में बेटियां हर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रही हैं. शिक्षा, नौकरी और सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ अब वे पारिवारिक परंपराओं को भी पूरी मजबूती से निभा रही हैं. वैशाली की यह घटना समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं.

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