मुजफ्फरपुर के इस्मशान घाट में पढ़ने वाली और स्लम बस्ती में रहने वाली दो बेटियों ने राज्यस्तरीय वुशू चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता है। अब ये राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खलेंगी। स्लम बस्ती में रहने वाली दो बेटियों माहिरा और संध्या ने आर्थिक तंगी और सीमित संसाधनों के बावजूद कमाल किया है। एक के पिता मजदूर है, तो दूसरे के पिता सब्जी बेचते हैं। दोनों ने भागलपुर के खेल भवन में आयोजित 16वीं राज्य स्तरीय वुशू चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर न सिर्फ अपने परिवार, बल्कि पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया है। दोनों बच्चियों का चयन अब राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ है, जहां वे बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगी। यह उपलब्धि उन्होंने सब जूनियर अंडर-14 वर्ग में हासिल की है। अप्पन पाठशाला से मिली नई पहचान सिकंदरपुर मुक्तिधाम परिसर में संचालित अप्पन पाठशाला में पढ़ने वाली माहिरा और संध्या की सफलता आज पूरे शहर के लिए प्रेरणा बन गई है। पढ़ाई के साथ-साथ दोनों ने वुशू खेल में भी कड़ी मेहनत की और अब राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का रास्ता तय कर लिया है। अपनी सफलता पर दोनों बच्चियों ने कहा कि यह उपलब्धि उनके प्रशिक्षकों सुनील कुमार, अजीत कुमार सिंह और खेलो इंडिया के प्रशिक्षक करण कुमार के मार्गदर्शन का परिणाम है। उन्होंने बताया कि गुरुजनों की मेहनत और लगातार प्रोत्साहन ने उन्हें यहां तक पहुंचाया है। सब्जी बेचने वाले की बेटी बनी गोल्ड मेडलिस्ट 11 साल माहिरा सिकंदरपुर कुंडल की रहने वाली है। उसके पिता सब्जी बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं, जबकि मां मजदूरी करती हैं। माहिरा पिछले पांच साल से अप्पन पाठशाला में पढ़ रही है और करीब डेढ़ साल से वुशू का प्रशिक्षण ले रही है। वह रोजाना लगभग दो घंटे अभ्यास करती है। माहिरा बताती है कि स्वर्ण पदक जीतने के बाद सबसे पहले उसने अपने शिक्षक को फोन कर यह खुशखबरी सुनाई। वह अपनी सफलता का श्रेय अपने प्रशिक्षकों और अप्पन पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार को देती है। मां करती हैं चौका-बर्तन, पिता हैं पलदार 12 साल संध्या सिकंदरपुर के अंबेडकर नगर स्लम बस्ती की निवासी है। उसके पिता पलदारी का काम करते हैं, जबकि मां घरों में चौका-बर्तन करके परिवार चलाती हैं। संध्या भी पिछले पांच साल से अप्पन पाठशाला में पढ़ाई कर रही है और साथ ही वुशू का प्रशिक्षण ले रही है। वह कहती है कि उसका सपना देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतना है। संध्या ने बताया है कि वो सांतवीं कक्षा में पढ़ती है। वो जमकर खेलती हैं और अब नेशनल खेल कर गोल्ड लाना है। राष्ट्रीय स्तर पर भी गोल्ड की उम्मीद अप्पन पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार ने कहा कि माहिरा और संध्या की सफलता उनके संघर्ष, अनुशासन और मेहनत का परिणाम है। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद दोनों बच्चियों ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी पहचान या आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। उन्हें पूरा विश्वास है कि दोनों खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर भी स्वर्ण पदक जीतकर बिहार और देश का नाम रोशन करेंगी। नेशनल चैंपियन कोच ने तराशी प्रतिभा वुशू प्रशिक्षक सुनील कुमार, जो स्वयं राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं, बताते हैं कि करीब दो साल पहले उनकी मुलाकात अप्पन पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार से हुई थी। बच्चों की प्रतिभा देखकर उन्होंने उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू किया। सुनील कुमार कहते हैं कि माहिरा और संध्या में असाधारण क्षमता है। अब राष्ट्रीय प्रतियोगिता की तैयारी के लिए दोनों को रोजाना करीब चार घंटे अभ्यास कराया जाएगा। संघर्ष से सफलता तक का सफर अपन पाठशाला के संचालक सुमित कुमार ने बताया कि बिल्कुल स्लम बस्ती की तंग गलियों से निकलकर राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने वाली माहिरा और संध्या आज हजारों बच्चों के लिए प्रेरणा बन गई हैं। आर्थिक अभाव के बीच उनकी यह सफलता बताती है कि यदि अवसर और सही मार्गदर्शन मिले तो कोई भी बच्चा अपनी प्रतिभा के दम पर नई ऊंचाइयों को छू सकता है।
सब्जी बेचने वाली-मजदूर की बेटी ने जीता गोल्ड:मुजफ्फरपुर स्लम बस्ती की दो बेटियां रोजाना 2 घंटा प्रैक्टिस करतीं, अब राष्ट्रीय चैंपियनशिप में दिखाएंगी दम
मुजफ्फरपुर के इस्मशान घाट में पढ़ने वाली और स्लम बस्ती में रहने वाली दो बेटियों ने राज्यस्तरीय वुशू चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता है। अब ये राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खलेंगी। स्लम बस्ती में रहने वाली दो बेटियों माहिरा और संध्या ने आर्थिक तंगी और सीमित संसाधनों के बावजूद कमाल किया है। एक के पिता मजदूर है, तो दूसरे के पिता सब्जी बेचते हैं। दोनों ने भागलपुर के खेल भवन में आयोजित 16वीं राज्य स्तरीय वुशू चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर न सिर्फ अपने परिवार, बल्कि पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया है। दोनों बच्चियों का चयन अब राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ है, जहां वे बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगी। यह उपलब्धि उन्होंने सब जूनियर अंडर-14 वर्ग में हासिल की है। अप्पन पाठशाला से मिली नई पहचान सिकंदरपुर मुक्तिधाम परिसर में संचालित अप्पन पाठशाला में पढ़ने वाली माहिरा और संध्या की सफलता आज पूरे शहर के लिए प्रेरणा बन गई है। पढ़ाई के साथ-साथ दोनों ने वुशू खेल में भी कड़ी मेहनत की और अब राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का रास्ता तय कर लिया है। अपनी सफलता पर दोनों बच्चियों ने कहा कि यह उपलब्धि उनके प्रशिक्षकों सुनील कुमार, अजीत कुमार सिंह और खेलो इंडिया के प्रशिक्षक करण कुमार के मार्गदर्शन का परिणाम है। उन्होंने बताया कि गुरुजनों की मेहनत और लगातार प्रोत्साहन ने उन्हें यहां तक पहुंचाया है। सब्जी बेचने वाले की बेटी बनी गोल्ड मेडलिस्ट 11 साल माहिरा सिकंदरपुर कुंडल की रहने वाली है। उसके पिता सब्जी बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं, जबकि मां मजदूरी करती हैं। माहिरा पिछले पांच साल से अप्पन पाठशाला में पढ़ रही है और करीब डेढ़ साल से वुशू का प्रशिक्षण ले रही है। वह रोजाना लगभग दो घंटे अभ्यास करती है। माहिरा बताती है कि स्वर्ण पदक जीतने के बाद सबसे पहले उसने अपने शिक्षक को फोन कर यह खुशखबरी सुनाई। वह अपनी सफलता का श्रेय अपने प्रशिक्षकों और अप्पन पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार को देती है। मां करती हैं चौका-बर्तन, पिता हैं पलदार 12 साल संध्या सिकंदरपुर के अंबेडकर नगर स्लम बस्ती की निवासी है। उसके पिता पलदारी का काम करते हैं, जबकि मां घरों में चौका-बर्तन करके परिवार चलाती हैं। संध्या भी पिछले पांच साल से अप्पन पाठशाला में पढ़ाई कर रही है और साथ ही वुशू का प्रशिक्षण ले रही है। वह कहती है कि उसका सपना देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतना है। संध्या ने बताया है कि वो सांतवीं कक्षा में पढ़ती है। वो जमकर खेलती हैं और अब नेशनल खेल कर गोल्ड लाना है। राष्ट्रीय स्तर पर भी गोल्ड की उम्मीद अप्पन पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार ने कहा कि माहिरा और संध्या की सफलता उनके संघर्ष, अनुशासन और मेहनत का परिणाम है। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद दोनों बच्चियों ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी पहचान या आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। उन्हें पूरा विश्वास है कि दोनों खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर भी स्वर्ण पदक जीतकर बिहार और देश का नाम रोशन करेंगी। नेशनल चैंपियन कोच ने तराशी प्रतिभा वुशू प्रशिक्षक सुनील कुमार, जो स्वयं राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं, बताते हैं कि करीब दो साल पहले उनकी मुलाकात अप्पन पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार से हुई थी। बच्चों की प्रतिभा देखकर उन्होंने उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू किया। सुनील कुमार कहते हैं कि माहिरा और संध्या में असाधारण क्षमता है। अब राष्ट्रीय प्रतियोगिता की तैयारी के लिए दोनों को रोजाना करीब चार घंटे अभ्यास कराया जाएगा। संघर्ष से सफलता तक का सफर अपन पाठशाला के संचालक सुमित कुमार ने बताया कि बिल्कुल स्लम बस्ती की तंग गलियों से निकलकर राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने वाली माहिरा और संध्या आज हजारों बच्चों के लिए प्रेरणा बन गई हैं। आर्थिक अभाव के बीच उनकी यह सफलता बताती है कि यदि अवसर और सही मार्गदर्शन मिले तो कोई भी बच्चा अपनी प्रतिभा के दम पर नई ऊंचाइयों को छू सकता है।


