Friday, May 15, 2026

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अखंड सौभाग्य, प्रकृति उपासना का प्रतीक वट सावित्री व्रत:पूजन सामग्री की दुकानों पर जुटी महिलाओं की भीड़, रक्षा सूत्र बांधकर वट वृक्ष की करेंगी परिक्रमा


इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या शनिवार को होगी, यह शनैश्चरी अमावस्या या शनि अमावस्या कहा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि को सूर्यपुत्र शनि का जन्म हुआ था। इसलिए इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या स्त्रियों के लिए धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, इसके साथ ही ज्योतिषीय महत्व भी है। इसको लेकर आज बाजार के पूजन सामग्री दुकानों पर भीड़ लगी रही। आचार्य अविनाश शास्त्री ने बताया कि इस वर्ष 16 मई (शनिवार) को देर रात 1:44 बजे तक अमावस्या तिथि रहेगी। ज्योतिष शास्त्र में तिथि निर्णय एवं माधवाचार्य, महामहोपाध्याय राजनाथ के मतानुसार आज शुक्रवार को सूर्यास्त के बाद अमावस्या तिथि का प्रवेश हुआ है। 16 मई को अमावस्या तिथि सूर्योदय से सूर्यास्त काल तक रहेगा, इसलिए शास्त्र सम्मत शनिवार को वटसावित्री व्रत होगा। वट सावित्री व्रत पर शनि जयंती का योग इस वर्ष वट सावित्री व्रत अमावस्या तिथि सूर्योदय से सूर्यास्त तक रहेगी और यह शनिवार को हो रहा है। इसलिए यह शनि अमावस्या ज्योतिषीय दृष्टिकोण से विशेष महत्वपूर्ण है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को ही शनि देव का जन्म हुआ था। इसलिए यह शनि जयंती के रूप में भी मनाया जाएगा। बरगद के साथ पीपल की भी होगी पूजा वट सावित्री व्रत में जहां एक तरफ बरगद के वृक्ष की पूजा करते हुए सौभाग्यवती स्त्री अपने पतियों के दीर्घायु जीवन की कामना करती है। वहीं दूसरी और शनिवार को पीपल के जड़ में जल डालते हुए पूजा भी करते हैं। इसलिए इस वर्ष बट सावित्री व्रत में पीपल एवं बरगद दोनों वृक्षों की पूजा होगी। भारतीय सनातन परंपरा में व्रत पर्व महोत्सव का विशेष महत्व है। प्रत्येक महीने हर ऋतु में अलग-अलग प्रकार के व्रत महोत्सव होते हैं। जिनका अपना विशेष वैज्ञानिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। गर्मी के तपती धूम में स्त्रियों के समूह को माथे पर कलश लेकर बरगद पेड़ के निकट जाती हैं, वटसावित्री व्रत पूजा उपासना का ही एक अंग है। बरगद बृक्ष का पूजन संरक्षण ही वटसावित्री व्रत इसी कड़ी में गर्मी के महीने में मानसून आने के पहले जब अत्यधिक धूप के कारण छोटे बड़े वृक्ष सूखने लगते हैं। तब स्त्रियों के द्वारा व्रत उपवास रखते हुए विशाल वृक्षों में से एक बरगद के वृक्ष को जलों से सींचते हुए पति के दीर्घायु जीवन एव सुख समृद्धि की मंगलकामना करती है। यह वटसावित्री या बरसाइत व्रत कहा गया है, यानी बरगद बृक्ष का पूजन संरक्षण ही वटसावित्री व्रत है। प्रकृति प्रेम का भी है उदाहरण धर्मवीर कुमार कहते हैं कि आर्यों की प्राचीन संस्कृति परंपरा में अग्नि, जल, वृक्ष, पर्वत आदि प्रकृति उपासना के साक्ष्य मिले हैं। वर्तमान सनातन धर्म से जुड़े हुए व्रत त्योहारों में भी हमें इसकी झलक मिलती है। अलग-अलग त्योहारों में नदियों के तट पर स्नान अलग-अलग वृक्षों की पूजा पहाड़ी क्षेत्रों के तीर्थ स्थलों का भ्रमण यह सब हमारे प्रकृति उपासना का ही प्रतीक है। वट सावित्री व्रत में बरगद के वृक्षों की पूजा स्त्रियों के द्वारा की जाती है। वह भी उस समय जब अत्यधिक गर्मी के कारण छोटे बड़े वृक्ष सूखने लगते हैं। यह हमारे प्राचीन ऋषि महर्षियों की दूर दृष्टि था। यह प्रकृति प्रेम का प्रत्यक्ष उदाहरण है कि हम पीपल एवं वृक्षों को पूजनीय मानते हुए वृक्ष की रक्षा करते हैं। क्या है विधि विधान व्रत के दिन बरगद वृक्ष के समीप जाकर सुवर्ण अथवा मिट्टी की सावित्री देवी की प्रतिमा स्थापित करते हुए वट वृक्ष एवं सावित्री देवी की पूजा करनी चाहिए। पूजन के तहत वृक्षों को कच्चे धागे से पांच या सात बार लपेटते हुए अखंड सौभाग्य की कामना करनी चाहिए। धूप, दीप, रोली, सिंदूर एवं पकवान अर्पित कर सप्तधान्य अर्पित करें। पूजन सामूहिक रूप से करना चाहिए।

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