हेल्थ रिपोर्टर|रांची झारखंड में तेजी से बढ़ती तंबाकू और निकोटीन उत्पादों की लत के कारण 18 से 25 वर्ष की उम्र के युवा भी मुंह, गले, हेड-नेक और फेफड़ों के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आने लगे हैं। वर्ल्ड नो टुबैको डे पर सामने आ रहे आंकड़े और विशेषज्ञों की राय इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। रांची के एक निजी कैंसर अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट के अनुसार, पहले कैंसर ओपीडी में आने वाले 100 मरीजों में एक या दो युवा मरीज होते थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर आठ से दस मरीज प्रति 100 तक पहुंच गई है। उन्होंने बताया कि पिछले एक वर्ष के दौरान उन्होंने सैकड़ों युवा कैंसर मरीजों का इलाज किया है, जिनमें अधिकांश मामलों का संबंध किसी न किसी रूप में तंबाकू सेवन से जुड़ा मिला। मेडिकल आंकोलॉजिस्ट डॉ. चंद्रप्रकाश बताते हैं कि अब ऐसे मरीज भी सामने आ रहे हैं जिनकी उम्र 20 से 25 वर्ष के बीच है और उनके मुंह में सफेद चकत्ते, प्री-कैंसरस घाव या शुरुआती कैंसर की पुष्टि हो रही है। यदि समय रहते तंबाकू नहीं छोड़ा गया तो यह स्थिति आने वाले वर्षों में और भयावह हो सकती है। तंबाकू और अन्य नशे की बढ़ती लत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पिछले एक वर्ष में रांची सहित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से करीब 12 हजार युवा नशामुक्ति सेवाओं तक पहुंचे। इनमें प्रमुख रूप से रिनपास, सीआईपी, जिला स्तर पर संचालित डि-एडिक्शन सेंटर और अन्य नशामुक्ति केंद्र शामिल हैं। केंद्रों से जुड़े चिकित्सकों और काउंसलरों के अनुसार, उपचार शुरू करने वाले युवाओं में से केवल 25 से 30 प्रतिशत ही पूरी तरह नशा छोड़ पाने में सफल हुए हैं। बड़ी संख्या में युवाओं ने बीच में ही इलाज छोड़ दिया, जबकि कई अभी भी नियमित काउंसलिंग व उपचार प्रक्रिया में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतियोगी माहौल, बेरोजगारी, शैक्षणिक दबाव, पारिवारिक तनाव और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण भी युवाओं में नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। कई मामलों में तंबाकू सेवन बाद में शराब और अन्य नशीले पदार्थों की ओर भी ले जाता है। “तंबाकू से होने वाले अधिकांश कैंसर रोके जा सकते हैं। सबसे जरूरी है कि युवा शुरुआती स्तर पर ही तंबाकू से दूरी बनाएं। यदि किसी को इसकी लत लग चुकी है तो उसे नशामुक्ति केंद्रों और विशेषज्ञों की मदद लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। आज जो लत दिख रही है, वही कुछ वर्षों बाद कैंसर के रूप में सामने आ सकती है। ’ डॉक्टरों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को मुंह में बार-बार छाले होना, सफेद या लाल धब्बे बनना, निगलने में परेशानी, लगातार खांसी, आवाज बैठना या गर्दन में गांठ जैसी शिकायतें हों तो तुरंत जांच करानी चाहिए। डॉ. चंद्रशेखर प्रसाद, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट चिंताजनक तस्वीर… {पहले 100 कैंसर मरीजों में 1-2 युवा होते थे {अब 100 मरीजों में 8-10 युवा कैंसर रोगी { पिछले एक साल में 12 हजार युवा (18 से 25 साल) नशामुक्ति केंद्रों तक पहुंचे { केवल 25-30% युवा ही पूरी तरह नशा छोड़ पाए { मुंह, हेड-नेक और फेफड़ों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे।
अब 18 साल के युवाओं को भी हो रहा मुंह और फेफड़ों का कैंसर
हेल्थ रिपोर्टर|रांची झारखंड में तेजी से बढ़ती तंबाकू और निकोटीन उत्पादों की लत के कारण 18 से 25 वर्ष की उम्र के युवा भी मुंह, गले, हेड-नेक और फेफड़ों के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आने लगे हैं। वर्ल्ड नो टुबैको डे पर सामने आ रहे आंकड़े और विशेषज्ञों की राय इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। रांची के एक निजी कैंसर अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट के अनुसार, पहले कैंसर ओपीडी में आने वाले 100 मरीजों में एक या दो युवा मरीज होते थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर आठ से दस मरीज प्रति 100 तक पहुंच गई है। उन्होंने बताया कि पिछले एक वर्ष के दौरान उन्होंने सैकड़ों युवा कैंसर मरीजों का इलाज किया है, जिनमें अधिकांश मामलों का संबंध किसी न किसी रूप में तंबाकू सेवन से जुड़ा मिला। मेडिकल आंकोलॉजिस्ट डॉ. चंद्रप्रकाश बताते हैं कि अब ऐसे मरीज भी सामने आ रहे हैं जिनकी उम्र 20 से 25 वर्ष के बीच है और उनके मुंह में सफेद चकत्ते, प्री-कैंसरस घाव या शुरुआती कैंसर की पुष्टि हो रही है। यदि समय रहते तंबाकू नहीं छोड़ा गया तो यह स्थिति आने वाले वर्षों में और भयावह हो सकती है। तंबाकू और अन्य नशे की बढ़ती लत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पिछले एक वर्ष में रांची सहित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से करीब 12 हजार युवा नशामुक्ति सेवाओं तक पहुंचे। इनमें प्रमुख रूप से रिनपास, सीआईपी, जिला स्तर पर संचालित डि-एडिक्शन सेंटर और अन्य नशामुक्ति केंद्र शामिल हैं। केंद्रों से जुड़े चिकित्सकों और काउंसलरों के अनुसार, उपचार शुरू करने वाले युवाओं में से केवल 25 से 30 प्रतिशत ही पूरी तरह नशा छोड़ पाने में सफल हुए हैं। बड़ी संख्या में युवाओं ने बीच में ही इलाज छोड़ दिया, जबकि कई अभी भी नियमित काउंसलिंग व उपचार प्रक्रिया में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतियोगी माहौल, बेरोजगारी, शैक्षणिक दबाव, पारिवारिक तनाव और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण भी युवाओं में नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। कई मामलों में तंबाकू सेवन बाद में शराब और अन्य नशीले पदार्थों की ओर भी ले जाता है। “तंबाकू से होने वाले अधिकांश कैंसर रोके जा सकते हैं। सबसे जरूरी है कि युवा शुरुआती स्तर पर ही तंबाकू से दूरी बनाएं। यदि किसी को इसकी लत लग चुकी है तो उसे नशामुक्ति केंद्रों और विशेषज्ञों की मदद लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। आज जो लत दिख रही है, वही कुछ वर्षों बाद कैंसर के रूप में सामने आ सकती है। ’ डॉक्टरों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को मुंह में बार-बार छाले होना, सफेद या लाल धब्बे बनना, निगलने में परेशानी, लगातार खांसी, आवाज बैठना या गर्दन में गांठ जैसी शिकायतें हों तो तुरंत जांच करानी चाहिए। डॉ. चंद्रशेखर प्रसाद, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट चिंताजनक तस्वीर… {पहले 100 कैंसर मरीजों में 1-2 युवा होते थे {अब 100 मरीजों में 8-10 युवा कैंसर रोगी { पिछले एक साल में 12 हजार युवा (18 से 25 साल) नशामुक्ति केंद्रों तक पहुंचे { केवल 25-30% युवा ही पूरी तरह नशा छोड़ पाए { मुंह, हेड-नेक और फेफड़ों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे।

