Sunday, July 12, 2026

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इंटरनेशनल मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स में गोड्डा के देवगन मरांडी:3 साल लड़े 13 फाइट्स, 11 में हासिल की जीत, NDA की तैयारी के दौरान जागा रुचि


झारखंड के गोड्डा के ललमटिया स्थित नीमकाला गांव के रहने वाला देवगन मरांडी इन दिनों अंतरराष्ट्रीय मंच अपना परचम लहरा रहा है। इंटरनेशनल मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स में काफी कम समय में इसे अपनी पहचान बनाई है। हाल की में कोलकाता में आयोजित भारत बनाम नेपाल इंटरनेशनल मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स प्रतियोगिता में उन्होंने शानदार जीत दर्ज कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। साधारण परिवार से आने वाला देवगन का यह सफर आसान नहीं रहा है। गांव की पृष्ठभूमि से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना उनके संघर्ष, मेहनत और लगन की कहानी को बयां करता है। स्थानीय लोग इसे गर्व के क्षण के रूप में देख रहे हैं। वहीं युवाओं के लिए यह प्रेरणा बनकर उभरा है कि सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं। संघर्ष, मेहनत और जुनून से मिली सफलता देवगन मरांडी ने इंटरनेशनल मुकाबले से पहले राष्ट्रीय स्तर पर 13 MMA फाइट्स में हिस्सा लिया। जिनमें उन्होंने 11 में जीत हासिल की। उत्तराखंड, दिल्ली, गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में खेले गए मुकाबलों ने उनके अनुभव को और मजबूत किया। उनकी शुरुआती पढ़ाई बेथल मिशन स्कूल महागामा से हुई, जहां से उन्होंने 2020 में मैट्रिक पास किया। इसके बाद उन्होंने भागलपुर से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 2023 में उन्होंने दिल्ली जाकर एनडीए की तैयारी शुरू की, लेकिन असफलता हाथ लगी। इसी दौरान उनके रूम पार्टनर अनुराग से प्रेरित होकर उन्होंने फाइटिंग की दुनिया में कदम रखा। ‘हाउस ऑफ ग्लैडिएटर्स’ एकेडमी में तीन वर्षों के कठिन प्रशिक्षण ने उन्हें नई पहचान दी। उनके पसंदीदा फाइटर जॉन जोंस रहे, जिनसे प्रेरणा लेकर उन्होंने खुद को निखारा। पिता सीसीएल से रिटायर, मां गृहिणी देवगन के पिता सांझला मरांडी ईसीएल ललमटिया से सेवानिवृत्त हैं, जबकि उनकी मां फुलमूनी टुडू गृहिणी हैं। सात भाइयों और एक बहन वाले इस बड़े परिवार में सभी ने देवगन का हौसला बढ़ाया। उनकी बहन गुलाबी मरांडी शिक्षिका बनने की तैयारी कर रही हैं। देवगन ने अपनी इस उपलब्धि के बाद मुख्यमंत्री से आर्थिक सहायता और ईसीएल से स्पॉन्सरशिप की मांग की है, ताकि वे आगे और बेहतर प्रदर्शन कर सकें। हाल ही में जीत के बाद गांव लौटने पर उन्होंने ललमटिया चौक पर सिद्ध-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी, जिसके बाद गांव में उनका भव्य स्वागत किया गया। उनकी यह सफलता न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि पूरे क्षेत्र और आदिवासी समाज के लिए प्रेरणादायक मिसाल बन गई है।

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