
जरूरी बातें
North Bengal Identity Politics: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच उत्तर बंगाल का राजनीतिक मिजाज पूरी तरह बदल चुका है. कभी ‘लाल गलियारे’ के नाम से मशहूर यह क्षेत्र, जहां राजनीति का केंद्र ‘वर्ग संघर्ष’ (Class Struggle) और मजदूर अधिकार हुआ करते थे, आज वहां ‘पहचान की राजनीति’ (Identity Politics) हावी है.
टीएमसी और भाजपा के लिए चनौतियां और अवसर
चाय बागानों के श्रमिकों से लेकर राजबंशी और गोरखा समुदायों तक, अब हर कोई अपनी सांस्कृतिक और जातीय पहचान को लेकर मुखर है. राजनीति के इस बड़े बदलाव ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए नयी चुनौतियां और अवसर पैदा कर दिये हैं.
वर्ग संघर्ष से पहचान की ओर : एक बड़ा राजनीतिक बदलाव
दशकों तक उत्तर बंगाल की राजनीति वामपंथी विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही. उस दौर में मुद्दा अमीर बनाम गरीब का था, लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है.
- जातीय अस्मिता का उदय : राजबंशी, कामतापुरी और गोरखा समुदाय अब केवल रोटी-बेटी की बात नहीं करते, वे अपनी भाषा, संस्कृति और अलग राज्य या स्वायत्तता की मांग को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं.
- भाजपा की सेंधमारी : पहचान की इसी राजनीति को भांपते हुए भाजपा ने 2019 और 2021 में यहां जबर्दस्त प्रदर्शन किया था. ‘मां-माटी-मानुष’ की बात करने वाली टीएमसी के लिए यह क्षेत्र एक कठिन चुनौती बना हुआ है.
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चाय बागानों का बदला मिजाज
उत्तर बंगाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ‘चाय बागान’ अब केवल ट्रेड यूनियन की राजनीति तक सीमित नहीं है. बागानों में काम करने वाली नयी पीढ़ी अब केवल न्यूनतम मजदूरी की बात नहीं करती. उन्हें पट्टा (भूमि अधिकार), बेहतर शिक्षा और अपनी जातीय पहचान का सम्मान चाहिए. आदिवासी और नेपाली भाषी समुदायों के बीच अपनी पहचान को लेकर बढ़ती जागरूकता ने पुराने राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है.
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कामतापुर और ग्रेटर कूचबिहार की मांग
राजबंशी समुदाय के बीच ‘कामतापुर’ और ‘ग्रेटर कूचबिहार’ की भावनाओं ने उत्तर बंगाल को अशांत और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया है. दोनों प्रमुख दल अब समुदाय के महापुरुषों (जैसे पंचानन बर्मा) के नाम पर योजनाएं शुरू कर रहे हैं. एक पक्ष इसे राज्य के विभाजन की साजिश बताता है, तो दूसरा पक्ष इसे ऐतिहासिक उपेक्षा के खिलाफ हक की लड़ाई करार देता है.
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North Bengal Identity Politics: 2026 में क्या होगा असर?
उत्तर बंगाल की इन 54 सीटों पर इस बार भी वही दल बाजी मारेगा, जो ‘पहचान के इस पेचीदा जाल’ को सुलझाने में कामयाब होगा. विकास के दावों के बीच, पहचान का मुद्दा एक ऐसा अंडरकरंट है, जो किसी भी वक्त चुनावी नतीजों को पलट सकता है. ममता बनर्जी का सांस्कृतिक कार्ड और भाजपा का पहचान आधारित राष्ट्रवाद इस बार आमने-सामने है.
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