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कोसी का कहर: आंखों के सामने घर और सपने निगल रही नदी, बेला गोठ से सियानी तक सैकड़ों परिवार बेघर

सुपौल से राजीव झा की रिपोर्ट

Kosi Flood : सुबह का सूरज उगता है, लेकिन बेला गोठ गांव के लोगों के चेहरे पर उजाला नहीं आता. यहां हर सुबह एक नया डर लेकर आती है. डर इस बात का कि पता नहीं आज कोसी नदी किसके घर को अपनी धारा में समा लेगी. कोई अपने घर की दीवारें टूटते देख रहा है, तो कोई वर्षों की मेहनत से बनाई गई अपनी दुनिया को नदी में बहते हुए. कोसी एक बार फिर अपने रौद्र रूप में है और उसके किनारे बसे सैकड़ों परिवार बेघर होने की कगार पर खड़े हैं.

किशनपुर प्रखंड की दुबियाही पंचायत स्थित बेला गोठ गांव इन दिनों कोसी कटाव की भयावह त्रासदी झेल रहा है. यहां अब तक करीब 30 परिवारों के घर नदी में समा चुके हैं. हालात ऐसे हैं कि लोगों को अपना सामान समेटने तक का पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है.

30 परिवारों के सिर से छिन गया आशियाना

कुछ दिन पहले तक जिन घरों के आंगन में बच्चे खेलते थे, जहां बुजुर्गों की चौपाल सजती थी, वहां आज सिर्फ मलबा और कोसी की गर्जना बची है. कटाव की रफ्तार इतनी तेज है कि कई परिवार अपनी आंखों के सामने अपना घर नदी में समाते देखने को मजबूर हैं.

ग्रामीण बताते हैं कि यह सिर्फ मकानों के टूटने का दर्द नहीं है. यह उन यादों, सपनों और जीवनभर की पूंजी के खत्म हो जाने की पीड़ा है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है.

कोसी का कहर: आंखों के सामने घर और सपने निगल रही नदी, बेला गोठ से सियानी तक सैकड़ों परिवार बेघर
खुले में खाना बनाने की मजबुरी

खुले आसमान के नीचे गुजर रही जिंदगी

कटाव से प्रभावित अधिकांश परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुनर्वास की है. जिनके घर उजड़ गए हैं, उनके पास कहीं और बसने के लिए जमीन नहीं है. मजबूरन लोग अपने घरों से बचा-खुचा सामान निकालकर बेला गोठ के ऊंचे स्थानों पर शरण लिए हुए हैं.

बरसात के मौसम में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं. बच्चों की पढ़ाई ठप पड़ गई है. वहीं भोजन, पेयजल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें भी बड़ी चुनौती बन चुकी हैं.

प्रशासन ने क्या किया?

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने कटाव प्रभावित इलाके का निरीक्षण तो किया, लेकिन राहत और बचाव के नाम पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

कुछ सप्ताह पहले अनुमंडल पदाधिकारी क्षेत्र का दौरा करने पहुंचे थे. उस दौरान ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि कटाव रोकने के लिए बांस की पायलिंग, तट सुरक्षा कार्य या राहत सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी. लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि हालात आज भी जस के तस हैं.

लोगों का मानना है कि यदि समय रहते कटावरोधी कार्य शुरू किया गया होता, तो कई घरों और बड़ी मात्रा में कृषि भूमि को बचाया जा सकता था.

बेला गोठ ही नहीं, कई गांवों पर मंडरा रहा खतरा

कोसी का खतरा सिर्फ बेला गोठ तक सीमित नहीं है. किशनपुर प्रखंड के मौजहा पंचायत के बगहा क्षेत्र में भी कटाव तेजी से बढ़ रहा है. वहीं सरायगढ़-भपटियाही प्रखंड के ढोली पंचायत के सियानी और ढोली गांवों में भी कोसी लगातार जमीन काट रही है.

स्थिति इतनी भयावह है कि कई परिवार पूरी रात जागकर नदी की गतिविधियों पर नजर रखते हैं, ताकि अचानक कटाव बढ़ने की स्थिति में अपने परिवार और सामान को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा सकें.

जानवर बांधने के जगह तक पहुंचा बाढ़ का पानी

हर साल उजड़ते हैं सपने, लेकिन समाधान अब भी दूर

कोसी क्षेत्र के लोगों के लिए यह कोई नई त्रासदी नहीं है. हर साल बाढ़ और कटाव हजारों परिवारों को बेघर कर देता है. लोग फिर से जीवन शुरू करते हैं, लेकिन स्थायी समाधान अब भी दूर है.

कटाव पीड़ितों का कहना है कि उन्हें सिर्फ राहत सामग्री नहीं, बल्कि सुरक्षित पुनर्वास, स्थायी कटावरोधी कार्य और भविष्य की सुरक्षा चाहिए. उनका दर्द यह है कि हर साल आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदलते.

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Kosi Flood : सामाजिक संगठन ने उठाई मांग

कोसी नव निर्माण मंच ने भी कटाव प्रभावित परिवारों की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है. संगठन ने मांग की है कि जिन परिवारों के घर नदी में समा चुके हैं, उन्हें तत्काल सरकारी जमीन पर पुनर्वासित किया जाए.

संगठन ने राज्य सरकार से कटावरोधी कार्य युद्धस्तर पर शुरू करने, क्षति मुआवजा देने, राहत शिविर, तिरपाल, पेयजल, शौचालय और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी मांग की है.

आज बेला गोठ, बगहा, सियानी और ढोली के उजड़े घर एक ही सवाल पूछ रहे हैं. आखिर कब तक कोसी हर साल सपनों को बहाती रहेगी. और कब तक लोग अपने ही घरों में बेघर होने को मजबूर रहेंगे.

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