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पश्चिम चंपारण गंडक नदी का जलस्तर बढ़ने और तटबंध टूटने के बाद पश्चिम चंपारण में बाढ़ ने हजारों परिवारों की जिंदगी उजाड़ दी है। घरों में पानी घुसने के बाद लोग अपना सामान छोड़कर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में तटबंधों पर शरण लेने को मजबूर हैं। चंपारण तटबंध पर बड़ी संख्या में बाढ़ पीड़ित परिवार तंबू लगाकर किसी तरह दिन काट रहे हैं। तटबंध पर तंबू बना आशियाना बाढ़ का पानी घरों में घुसने से कई परिवारों का घरेलू सामान बर्बाद हो गया है। अब तटबंध ही इन परिवारों का अस्थायी आशियाना बन गया है। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग खुले में रहने को मजबूर हैं। बारिश और पानी के बीच तिरपाल के नीचे रात गुजारना उनकी मजबूरी बन गई है। भोजन-पानी के लिए परेशानी बाढ़ पीड़ितों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भोजन और पीने के पानी की है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि वे एक वक्त के भोजन के इंतजार में दिन गुजार रहे हैं। कई परिवारों को नियमित रूप से खाना नहीं मिल पा रहा है और उन्हें दूसरों की मदद पर निर्भर रहना पड़ रहा है। सामुदायिक रसोई शुरू, फिर भी शिकायत प्रशासन की ओर से बाढ़ प्रभावितों के लिए सामुदायिक रसोई शुरू की गई है। हालांकि, पीड़ितों का आरोप है कि रसोई का लाभ सभी जरूरतमंद परिवारों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कुछ परिवारों को भोजन मिलने के बावजूद कई लोग अब भी मदद की आस में बैठे हैं। बच्चों और बुजुर्गों की बढ़ी मुश्किल खुले में रहने के कारण सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को हो रही है। साफ पानी, भोजन और दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने से उनकी मुश्किल और बढ़ गई है। बाढ़ पीड़ितों को संक्रमण और बीमारियों का भी डर सता रहा है। प्रशासन से नियमित राहत की मांग बाढ़ पीड़ित परिवारों ने प्रशासन से तटबंध पर नियमित भोजन, पीने का पानी, दवाएं और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है। पीड़ितों का कहना है कि जब तक पानी नहीं उतरता, तब तक तटबंध पर रहने वाले परिवारों के लिए राहत व्यवस्था लगातार जारी रहनी चाहिए।
गंडक का कहर- तटबंध पर तंबुओं में कट रही जिंदगी:हजारों परिवार बेघर, एक वक्त के भोजन का इंतजार; घरेलू सामान बर्बाद
