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भास्कर न्यूज | गढ़वा जिस स्कूल में बच्चों की बुनियाद मजबूत होनी चाहिए, वहां कई आधारभूत कमियां हैं। इन कमियों को दूर करने के प्रयास सरकार और प्रशासनिक स्तर पर नाकाफी हैं। गौर किया जाए तो यह विषय प्राथमिकता की सूची में है ही नहीं। राज्य के 14 जिलों के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां 15452 शिक्षकों के पद खाली हैं। जबकि 2146 स्कूल ऐसे हैं जहां मात्र एक शिक्षक हैं।जिन स्कूलों में एक शिक्षक हैं वहां स्थिति और दयनीय है। शिक्षक के विभागीय कार्य से जाने पर बच्चे रसोइयों के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं। एमडीएम भोजन कराने के बाद बच्चे घर भेज दिए जाते हैं। बच्चों को समय से कॉपी-किताब मिले, स्कूल ड्रेस मिले, हर विषय के अलग-अलग प्रशिक्षित शिक्षक हों यह सपने की तरह है। कहीं स्कूल गोशाला बना है तो कहीं दबंगों का अड्डा। सरकार की कई योजनाएं और अिभयान संसाधनों की कमी के कारण दम तोड़ देती हैं। रुआर मिशन के तहत बच्चों को फिर से स्कूल से जोड़ने के अभियान के बाद यह प्रश्न लाजिमी है कि जिसे फिर से स्कूल लाया गया है उसे पढ़ाएगा कौन। जब स्कूलों में िशक्षक का अकाल हो तो महत्वपूर्ण िवषयों को कौन पढ़ाएगा। िवज्ञान, गणित, समाजशास्त्र िवषय के प्रशिक्षित िशक्षक स्कूल में नहीं हैं। स्कूल में िहंदी, अंग्रेजी पढ़ाने वाले िशक्षक ही िवज्ञान, गणित की कक्षाएं लेकर कोरम पूरा करते हैं। प्राथमिक और िमडिल स्कूलों के िवद्यार्थियों की िजज्ञासा का जवाब नहीं िमल पाता है। पढ़ाई में आधारभूत कमी के कारण दसवीं के बच्चे पांचवीं-छठी कक्षा के गणित या िवज्ञान के प्रश्न हल नहीं कर पाते। प्रश्न यही है िक सरकारी स्तर पर व्यवस्था को दुरुस्त करने पर कब ध्यान िदया जाएगा। ‘स्कूल रूआर’ झारखंड सरकार के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा चलाया जाने वाला एक विशेष “बैक टू स्कूल” अभियान है। इसमें स्कूल छोड़ चुके बच्चों को स्कूल से जोड़ा जाता है। यह अभियान पूरे अप्रैल महीने तक चलता है। जो बच्चे स्कूल से जुड़कर फिर छोड़ देते हैं उससे जुड़े बुनियादी सवाल पर गौर किए बिना ही हर वर्ष अभियान शुरू कर दिया जाता है। पर अहम प्रश्न यह है कि जिन बच्चों को स्कूल से जोड़ा जाता है उनकी पढ़ाई सुचारू हो इसकी व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस तरह का अभियान सरकारी रस्म अदायगी की तरह होकर रह जाते हैं। बच्चों की शिक्षा से जुड़े कई अभियान की तरह ही यह अभियान बीच रास्ते में ही दम तोड़ देती है। शिक्षकों की कमी, मध्याह्न भोजन में अनियमितता महत्वपूर्ण सवाल हैं। इसके अलावा स्कूलों का वातावरण भी बहुत मायने रखता है। कहीं भी पढ़ाई का सुखद माहौल नहीं दिखाई देता। क्षतिग्रस्त और असुरक्षित स्कूल में पढ़ाई भी अहम प्रश्न है। जिले के कई शिक्षा अधिकारियों ने अपनी विवशता दिखाई। उनका कहना है कि हर माह कोई ना कोई शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसे में शिक्षकों की संख्या कम होती जा रही है। शिक्षक को डिपुटेशन में डालकर काम चलाया जा रहा है। सरकार से शिक्षकों की नियुक्ति की मांग की गई है ताकि स्कूलों में पढाई सुचारु हो सके। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि शिक्षक की कमी है, इसमें हम कुछ नहीं कर सकते है। सीमित संसाधन में अपना काम कर रहे हैं। बच्चों की संख्या के आधार पर शिक्षकों का प्रतिनियोजन कर काम चलाया जा रहा है। एकल शिक्षक वाले स्कूलों में भी जरूरत के हिसाब से शिक्षकों का प्रतिनियुक्ति किया गया है। जिला पद खाली एक शिक्षक गुमला 1050 15 कोडरमा 200 119 पलामू 4000 349 लातेहार 1000 200 खूंटी 459 92 सिमडेगा 1017 191 चतरा 50 3 39 बोकारो 1000 57 गिरिडीह 1500 200 पूर्वी सिंहभूम 800 45 प. सिंहभूम 669 581 हजारीबाग 481 217 सरायकेला 2643 33 लोहरदगा 130 8


