
West Bengal News: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भारतीय रेल में यात्रा टिकट परीक्षकों (TTE) की कार्यशैली पर बेहद तीखी और सख्त टिप्पणी की है. अदालत ने कहा है कि कुछ टीटीई रेलगाड़ियों में खाली बर्थ को ‘बाजार में सब्जियों की तरह बेचते हैं’. हाईकोर्ट ने देश के सभी रेलवे मंडलों के महाप्रबंधकों (GMs) को निर्देश दिया है कि ट्रेनों में रिश्वत लेकर बर्थ आवंटित करने वाले टीटीई के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करें.
जस्टिस राजशेखर मंथा और जस्टिस विश्वरूप चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि टीटीई की इसी तरह की गैर-जिम्मेदाराना हरकत और भ्रष्टाचार के कारण ट्रेन में 2 यात्रियों से नशा खुरानी (मादक पदार्थ देकर लूटपाट) हुई, जिसमें से एक यात्री की मौत हो गयी.
क्या था पूरा मामला?
फरवरी 2009 की घटना का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि न्यू जलपाईगुड़ी से सियालदह आ रही तीस्ता-तोरसा एक्सप्रेस में 2 यात्री (अरुण चक्रवर्ती और सुनील कुमार दास) अनारक्षित (Unreserved) टिकट लेकर सवार हुए. अपनी पुरानी आदत के अनुसार, उन्होंने ऑन-ड्यूटी टीटीई को रिश्वत देकर ट्रेन में बर्थ हासिल कर ली.
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नशे के ओवरडोज से यात्री की हो गयी मौत
यात्रा के दौरान ट्रेन में सवार 2 अपराधियों ने दोनों यात्रियों को अपना शिकार बनाया. उन्हें नशीला पदार्थ पिलाकर उनके कीमती सामान लूट लिये. अत्यधिक नशीले पदार्थ के सेवन और पहले से बीमार होने के कारण सुनील कुमार दास की मौत हो गयी. 9 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहने के बाद अरुण चक्रवर्ती की जान बची.
अपराध की मूल वजह टीटीई की लापरवाही : हाईकोर्ट
न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति विश्वरूप चौधरी की पीठ ने कहा- यह अदालत इस फैसले की प्रति पूर्वी रेलवे सहित देश के सभी रेलवे मंडलों के महाप्रबंधकों को भेज रही है, ताकि ट्रेन की खाली बर्थ को बाजार में सब्जियों की तरह बेचने वाले टीटीई के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो. ऐसे अपराधों के लिए टीटीई की भूमिका ही मूल कारण बनती है, क्योंकि बिना आधिकारिक प्रक्रिया के रिश्वत देकर बर्थ हासिल करने वाले यात्रियों का कोई रिकॉर्ड नहीं होता, जिससे उनकी सुरक्षा से खिलवाड़ होता है.
कोर्ट से सहमत हुए वकील – बिना रिजर्वेशन वाले यात्रियों की पहचान मुश्किल
अदालत में सुनवाई के दौरान वकीलों ने भी माना कि बिना पूर्व आरक्षण के रिश्वत देकर बर्थ लेने वाले यात्रियों की पहचान करना असंभव होता है, क्योंकि उनका नाम, मोबाइल नंबर या अन्य पहचान विवरण रेलवे चार्ट में दर्ज नहीं होता.
पुलिस जांच और अभियोजन की आलोचना
हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच में हुई गंभीर खामियों के लिए पुलिस और जांच अधिकारियों को भी फटकार लगायी. अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने मृतक की विसरा रिपोर्ट तक फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) से प्राप्त नहीं की, जो एक अक्षम्य चूक है.
आजीवन सजा पा चुके आरोपी अभी जमानत पर
इस मामले में निचली अदालत (सियालदह सत्र अदालत) ने 10 जुलाई 2017 को आलोक घोष और गोपाल मिस्त्री को आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 328 (जहर देना) और चोरी के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनायी थी. दोनों आरोपी 10 से 16 साल जेल में बिताने के बाद फिलहाल जमानत पर हैं.
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