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दरभंगा के मनीगाछी प्रखंड के भंडारिसम गांव में मां बाणेश्वरी भगवती स्थान पर नवरात्र के आखिरी दिन बिहार के अलग-अलग जिलों के अलावा, नेपाल से भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर इस मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं का आगमन होता है। मान्यता है कि मां बाणेश्वरी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है। मंदिर का इतिहास करीब 600 साल पुराना बताया जाता है। प्राचीन काले पत्थर की प्रतिमा, मंदिर परिसर में मौजूद पुराना पेड़ और आसपास की धार्मिक परंपराएं इस देवी स्थान को खास बनाती है। मां बाणेश्वरी भगवती स्थान की उत्पत्ति को लेकर कई कहानियां, मान्यताएं मां बाणेश्वरी भगवती स्थान की उत्पत्ति को लेकर स्थानीय स्तर पर कई कहानियां, मान्यताएं हैं। ग्रामीणों के अनुसार, प्राचीन काल में भंडारिसम गांव में एक ब्राह्मण परिवार में देवी ने बेटी के रूप में जन्म लिया। उनका नाम बाणेश्वरी बताया जाता है। उनकी सुंदरता, शील और स्वभाव की चर्चा दूर-दूर तक फैली थी। लोककथा के अनुसार, तत्कालीन शासक की ओर से उन्हें बलपूर्वक अपने साथ ले जाने और विवाह करने का प्रयास किया गया। इस परिस्थिति में बाणेश्वरी ने पत्थर का रूप धारण कर लिया और गांव के एक तालाब में समा गईं। मान्यता है कि कई वर्षों तक जल में रहने के बाद देवी ने गांव के एक बुजुर्ग को स्वप्न में दर्शन देकर अपने अस्तित्व की जानकारी दी और तालाब से बाहर निकालने का संकेत दिया। इसके बाद खोजबीन के दौरान पत्थर के रूप में देवी की प्रतिमा मिलने की कथा प्रचलित है। बताया जाता है कि प्रतिमा को पहले एक पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की गई। बाद में यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ और मां बाणेश्वरी की पूजा व्यवस्थित रूप से होने लगी। दरभंगा राजपरिवार की मन्नत पूरी होने पर बना भव्य मंदिर मां बाणेश्वरी भगवती स्थान के वर्तमान मंदिर का निर्माण दरभंगा राजपरिवार से जुड़ा बताया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, दरभंगा महाराजा के परिवार की एक महारानी ने संतान प्राप्ति की कामना से मां के दरबार में प्रार्थना की थी। मनोकामना पूरी होने के बाद मंदिर निर्माण कराया गया। उपलब्ध स्थानीय विवरणों में मंदिर निर्माण का वर्ष 1912 में बताया जाता है। वर्तमान मंदिर में प्राचीन प्रतिमा स्थापित है, जहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना होती है। मंदिर परिसर का भूखंड आसपास की जमीन की तुलना में काफी ऊंचा है। ग्रामीण इसे डीह के रूप में पहचानते हैं। उनके अनुसार, मंदिर से लगभग 200 मीटर दूर स्थित तालाब देवी के अवतरण की लोककथा से जुड़ा है। मंदिर और तालाब के बीच का यह संबंध आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। पुराने पेड़ से जुड़ी आस्था, आज भी होती है पूजा मंदिर के पीछे स्थित एक पुराने पेड़ को लेकर भी ग्रामीणों के बीच गहरी आस्था है। स्थानीय ग्रामीण संजीव कुमार झा और अमित कुमार बताते हैं कि मां की प्रतिमा मिलने के बाद इसे इसी पेड़ के नीचे रखा गया था। बाद में मंदिर का निर्माण हुआ और प्रतिमा को मंदिर में स्थापित किया गया। इसके बावजूद पेड़ के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था बनी हुई है और आज भी वहां पूजा-पाठ किया जाता है। ग्रामीणों का दावा है कि पेड़ को काटने या हटाने का प्रयास किए जाने पर असामान्य घटनाएं हुईं।पेड़ से खून निकलने लगता है।इसी कारण लोग इसे देवी की शक्ति से जोड़कर देखते हैं। मंदिर परिसर से संबंधित अन्य कई मान्यताएं भी स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित हैं। आसपास खुदाई के दौरान शिवलिंग और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं मिलने की बात भी ग्रामीण बताते हैं। इन वस्तुओं को धार्मिक महत्व के साथ देखा जाता है और कुछ की पूजा मंदिर परिसर में की जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह स्थान तंत्र साधना के लिए भी प्रसिद्ध रहा है। रात में मंदिर परिसर में नहीं रुकने की परंपरा और यहां शक्तियों के मौजूद होने की मान्यताएं भी प्रचलित हैं। वैशाली के महंत बोले- बचपन से मां के दरबार में आ रहा हूं वैशाली जिले के पातेपुर स्थित रामजानकी मठ के महंत विशमोहन दास भी मां बाणेश्वरी के अनन्य भक्तों में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि उनका जन्मस्थान मंदिर से करीब 10 किलोमीटर दूर है। बचपन से ही वह मां के दर्शन के लिए यहां आते रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह पातेपुर से आए हैं और पहले उचटी भगवती का दर्शन करने के बाद मां बाणेश्वरी के दरबार पहुंचे हैं। महंत विशमोहन दास ने कहा, “मां बाणेश्वरी का दरबार बहुत ही सिद्धपीठ है। यहां से मांगा गया आशीर्वाद और सच्चे मन से की गई प्रार्थना भक्तों को विश्वास और संबल देती है। मां की महिमा अपरंपार है। वह सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखती हैं।” उन्होंने मंदिर में मां के शृंगार की भी सराहना की। उनके अनुसार, मंदिर परिसर का लगातार विकास हो रहा है और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए आगे भी बेहतर आयोजन की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अगले वर्ष इससे भी बड़ा आयोजन करने की योजना है। सड़क और रेल मार्ग से पहुंच सकते हैं श्रद्धालु मां बाणेश्वरी भगवती स्थान पहुंचने के लिए सड़क और रेल दोनों मार्गों का विकल्प उपलब्ध है। मंदिर मनीगाछी रेलवे स्टेशन से लगभग तीन किलोमीटर और जगदीशपुर रेलवे स्टेशन से करीब दो किलोमीटर दूर बताया जाता है। सड़क मार्ग से श्रद्धालु दरभंगा-बाजितपुर मार्ग होते हुए भंडारिसम गांव पहुंच सकते हैं। ग्रामीण परिवेश के बीच स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय इतिहास और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। प्राचीन प्रतिमा, राजपरिवार से जुड़ी मंदिर निर्माण की मान्यता, तालाब और पेड़ से संबंधित लोककथाएं तथा नवरात्र और रामनवमी के आयोजन इस स्थान की विशिष्टता को बढ़ाते हैं। श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती आवाजाही से यह स्थल धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनता जा रहा है। आस्था, परंपरा और लोकविश्वास के संगम के रूप में मां बाणेश्वरी भगवती स्थान आज भी मिथिलांचल की धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
दरभंगा- मां बाणेश्वरी भगवती स्थान की 600 साल पुरानी मान्यता:नवरात्रि में नेपाल से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु, दरभंगा राजपरिवार की मन्नत पूरी होने पर बना भव्य मंदिर
