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नालंदा में 125 करोड़ खर्च के बावजूद ट्रैफिक सिस्टम फेल:ट्रैफिक सिग्नल फेल, चालान चालू; शहर में 500 CCTV से भी नहीं हो रहा कंट्रोल


बिहार शरीफ शहर में ट्रैफिक जाम से लोग परेशान हैं। चौराहों पर लगे ट्रैफिक सिग्नलों की बत्ती महीनों से गुल है, लेकिन नियमों के नाम पर वाहन चालकों के चालान अब भी धड़ल्ले से काटे जा रहे हैं। यातायात व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से करोड़ों रुपए की लागत से लगाए गए ट्रैफिक सिग्नल अब पूरी तरह से शोपीस बनकर रह गए हैं। सबसे बुरा हाल अस्पताल चौक का है, जहां पिछले एक महीने से मात्र एक ही लाइट के सहारे पूरा ट्रैफिक कंट्रोल किया जा रहा है। शहर के ट्रैफिक को हाईटेक तरीके से नियंत्रित करने के लिए स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत इंटीग्रेटेड कंट्रोल एंड कमांड सेंटर (आई ट्रिपल सी) की स्थापना की गई थी। शुरुआत में इस महत्वाकांक्षी योजना की लागत 102.94 करोड़ रुपए थी, जो बाद में बढ़कर 125 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। इस भारी-भरकम बजट से बिहार थाना परिसर में आई ट्रिपल सी भवन का निर्माण किया गया। शहर के चप्पे-चप्पे पर नजर रखने के लिए 500 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए और इमरजेंसी कॉल बॉक्स भी बनाए गए। इसके बावजूद, धरातल पर स्थिति यह है कि न तो शहर का ट्रैफिक कंट्रोल हो पा रहा है और न ही प्रशासन का कोई ‘कमांड’ नजर आ रहा है। मेंटेनेंस के अभाव में 2 महीने में ही लाइटें खराब यातायात व्यवस्था सुधारने की यह कवायद चार दिसंबर 2021 को अस्पताल चौक से शुरू हुई थी। शुरुआत में लोगों के लिए यह व्यवस्था नई थी और उन्होंने नियमों का पालन भी किया। लेकिन रखरखाव के अभाव में महीने-दो महीने के भीतर ही लाइटें खराब होने लगीं और पूरी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। आज हालत यह है कि लोग सरेआम लाल बत्ती जंप कर रहे हैं। आम जनता तो दूर, पुलिस और बड़े अधिकारियों तक की गाड़ियां लाल बत्ती होने के बावजूद बेरोकटोक पास करा दी जाती हैं। अस्पताल मोड़ के अलावा शहर के देवीसराय चौक, करगिल चौक, 17 नंबर मोड़, भरावपर चौराहा, सोहसराय मोड़, अम्बेर मोड़, खंदक मोड़, भैंसासुर मोड़ और मछली मार्केट जैसे प्रमुख स्थानों पर भी ट्रैफिक लाइटें लगाई गई थीं। इनमें से भरावपर, 17 नंबर मोड़ और करगिल चौक के सिग्नल तो ओवरब्रिज व सड़क निर्माण कार्य की भेंट चढ़ गए। सोहसराय, अंबेर और खंदक मोड़ सहित अन्य जगहों पर कुछ दिन लाइटें जली और फिर हमेशा के लिए बंद हो गईं। अब इन खराब पड़े सिग्नलों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।आ आम जनता को कोई लाभ नहीं मिल रहा सुरक्षा और निगरानी के नाम पर लगाए गए 500 से अधिक कैमरों का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। आधे से ज्यादा कैमरे कबाड़ में तब्दील हो चुके हैं। जो गिने-चुने कैमरे काम कर रहे हैं, उनकी गुणवत्ता इतनी खराब है कि उनके नीचे से गुजरने वाले किसी भी व्यक्ति का चेहरा स्पष्ट रूप से नहीं पहचाना जा सकता। ट्रैफिक लाइटों के ठीक नीचे ई-रिक्शा का बेतरतीब कब्जा रहता है और आम नागरिक रोज जाम से जूझने को मजबूर हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि 125 करोड़ रुपए फूंकने के बाद भी क्या जनता को कोई लाभ मिला, या फिर उनकी गाढ़ी कमाई पूरी तरह से पानी में बह गई।

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