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‘बिहार में सिर्फ मोदी-नीतीश मॉडल ही चलेगा।’ मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने यह बात कही। उसके बाद से वह सदन से लेकर भाषणों तक में इस लाइन को कई बार दोहरा चुके हैं। बार-बार पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिल रहे हैं। सम्राट चौधरी के शुरुआती 11 दिन ‘संतुलन’ बनाने के दिख रहे हैं। लेकिन क्या वे आने वाले समय में अपनी अलग पहचान बना पाएंगे या ‘नीतीश की विरासत’ के वाहक बनकर ही रह जाएंगे। जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…। सम्राट सरकार के नीतीश मॉडल पर चलने के 3 संकेत 1. अफसरों की पुरानी लॉबी अक्सर देखा जाता है कि जब भी कोई नया मुख्यमंत्री कार्यभार संभालता है तो वह अपनी पसंद के अधिकारियों की टीम बनाता है। लेकिन सम्राट चौधरी के मामले में तस्वीर अलग है। उनके इर्द-गिर्द आज भी वही अधिकारी हैं, जो पिछले कुछ सालों से नीतीश कुमार के ‘कोर ग्रुप’ का हिस्सा रहे हैं। 2. नीतीश की पॉलिसी को कॉपी किया सम्राट चौधरी केवल अफसरों के मामले में ही नहीं, बल्कि कार्यशैली में भी नीतीश मॉडल को ही अपना रहे हैं। उनकी पॉलिसी को कॉपी भी कर रहे हैं। जैसे-11 शहरों में नई ग्रीनफील्ड टाउनशिप बनाने का ऐलान। नीतीश कुमार की 10वीं सरकार की पहली कैबिनेट की बैठक (25 नवंबर 2025) में टाउनशिप बनाने पर मुहर लगी। उसी एजेंडे को सम्राट चौधरी ने भी अपनी पहली कैबिनेट की बैठक (22 अप्रैल 2026) में मुहर लगाई। मतलब एक ही योजना को दोनों नेताओं ने अपनी पहली कैबिनेट में जगह दी। इसके अलावा जीविका दीदी को पैसा देना हो, 5 साल में एक करोड़ रोजगार का वादा जैसी नीतीश कुमार की योजनाओं को पूरा करने की सम्राट चौधरी तैयारी कर रहे हैं। 3. 10 दिन में 4 बार नीतीश से मिले सम्राट सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बनने के बाद भी नीतीश कुमार से लगातार संपर्क में हैं। बीते 10 दिनों में उन्होंने 4 बार (15, 18, 22 और 25 अप्रैल) नीतीश कुमार से मुलाकात की। इसमें से एक बार नीतीश कुमार खुद सम्राट चौधरी के आवास पहुंचे। बाकी 3 बार सम्राट चौधरी उनसे मिलने 1, अणे मार्ग पहुंचे। सम्राट चौधरी का नीतीश कुमार से बार-बार मिलना और महत्वपूर्ण फैसलों पर चर्चा करना यह दर्शाता है कि वे ‘नीतीश की छांव’ से पूरी तरह बाहर नहीं निकलना चाहते। नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री पद से हट गए हों, लेकिन सरकार की चाबी और अनुभवी अफसरों का रिमोट आज भी उनके अनुभव से जुड़ा है। 2 पॉइंट में नीतीश की छांव से क्यों नहीं निकल पा रहे सम्राट 1. नीतीश के वोट बैंक को नाराज नहीं करना है सम्राट के नीतीश की छाया से बाहर नहीं निकलने का सबसे बड़ा कारण उनका वोट बैंक हैं। नीतीश कुमार का मुख्य वोट बैंक कुर्मी (उनकी जाति), महादलित, EBC और कुछ मुस्लिम-दलित समूहों में है। 2. नीतीश कुमार की मजबूत सामाजिक-प्रशासनिक पकड़ नीतीश कुमार के पास 2 दशक का मुख्यमंत्री के रूप में अनुभव और राज्य के प्रशासन पर मजबूत पकड़ है। सम्राट चौधरी राजनीति में अनुभवी हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर वे 12 दिन पहले तक नीतीश के नेतृत्व वाले कैबिनेट का हिस्सा थे। अगर नीतीश की छाया से नहीं निकले तो क्या होगा अगर सम्राट चौधरी इसी पुरानी लॉबी और नीतीश की नीतियों के सहारे चलते रहे, तो सवाल यह उठता है कि भाजपा का ‘अपना स्वतंत्र मॉडल’ क्या होगा? इसके नफा-नुकसान दोनों हैं। फायदाः नीतीश कुमार की लकीरों पर चलने से सबसे बड़ा फायदा है कि सरकार में स्थिरता बनी रहेगी। काम चलता रहेगा। चूंकि नीतीश कुमार के साथ आने से NDA का राजनीतिक समीकरण ऐसा है कि विपक्ष को सत्ता में आने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। भाजपा को सत्ता के लिए विपक्ष से कड़ी चुनौती मिलने की गुंजाइश कम है। हालांकि, युवाओं की बढ़ती आकांक्षाओं से आगे चलकर यह गणित गड़बड़ा भी सकता है। नुकसानः सम्राट सरकार भी नीतीश मॉडल पर ही चली, कोई बदलाव नहीं हुआ तो भाजपा कार्यकर्ताओं और जनता के बीच संदेश जा सकता है कि केवल चेहरा बदला है, चाल-चरित्र और काम करने का तरीका अब भी पुराना ही है। मोटे तौर पर 3 तरह के नुकसान हो सकते हैं… 1. टूट सकता है कोर वोटर 2. तेज तरक्की की उम्मीद लगाए युवा नाराज हो सकते हैं 3. मायूस हो सकता है भाजपा का कैडर


