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दादा-दादी की लोककथाओं से प्रेरित 13 मिनट की ‘आंगेन’ ने रचा इतिहास झारखंड की कला, संस्कृति और भाषाई पहचान के लिए आज का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया है। नई दिल्ली में घोषित हुए 72वें नेशनल फिल्म पुरस्कारों में पहली बार किसी संथाली फिल्म ने देश के सबसे प्रतिष्ठित सिनेमाई मंच पर अपनी धाक जमाई है। नॉन-फीचर फिल्म कैटेगरी में झारखंड के लाल रवि राज मुर्मू को उनकी संथाली शॉर्ट फिक्शन फिल्म ‘आंगेन’ (अदृश्य) के लिए ‘बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर’ का नेशनल अवॉर्ड दिए जाने की घोषणा की गई है। दलमा मोशन पिक्चर्स के बैनर तले बनी 13 मिनट की यह फिल्म न केवल नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली पहली संथाली फिल्म बनी है, बल्कि इससे पहले यह मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल -2024 में चुनी जाने वाली भी इकलौती संथाली फिल्म थी। बचपन की लोककथाएं ही मेरा सिनेमाई खजाना
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) पुणे से डायरेक्शन व एडिटिंग के गुर सीखने वाले रवि राज मुर्मू अपनी इस ऐतिहासिक जीत पर भावुक हैं। उन्होंने विशेष बातचीत में बताया, “संथाली भाषा में ‘आंगेन’का अर्थ होता है ‘अदृश्य’। बचपन में मेरे दादा-दादी जो लोककथाएं सुनाते थे, उनका मेरे मानसपटल पर गहरा असर था। उन कहानियों में हमारे आदिवासी समुदाय का संघर्ष, उनकी सांस्कृतिक समृद्धता और ऐतिहासिक गहराई छिपी है। मेरा मकसद हमेशा से अपनी इस समृद्ध विरासत को वैश्विक स्तर पर बड़े पर्दे पर लाना था। आज जब देश का सबसे बड़ा सिनेमा सम्मान मिला, तो लग रहा है कि सालों की हमारी तपस्या साकार हो गई। संघर्ष की दास्तान: किसान के घर से निकलकर एफटीआईआई का सफर
पूर्वी सिंहभूम के छोटे से गांव कुमीरमुडी के रहने वाले रवि के पिता महेश्वर मुर्मू साधारण किसान हैं। बचपन में ही मां कपरा मुर्मू का साया सिर से उठ जाने के बाद उनकी दूसरी मां मीनू मुर्मू ने रवि के सपनों को कभी मरने नहीं दिया। गांव से शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की। साल 2016 में उन्होंने एफटीआईआई पुणे से एडिटिंग में पीजी पूरा किया। मुंबई में कई फिल्मों में बतौर एडिटर काम करने के बाद, अपनी जड़ों का कर्ज चुकाने के लिए जमशेदपुर का रुख किया ताकि संथाली सिनेमा को आगे बढ़ा सकें। फिलहाल संथाली फीचर फिल्म ‘सूंडी : द रॉबिनहुड ऑफ संथाल’ का कृष्णा सोरेन संग डायरेक्ट कर रहे हैं।

