![]()
चतरा के लावालौंग थाना क्षेत्र के लुटू सोहावन गांव का रहने वाला ब्रजेश सिंह गंझू कभी अपने गांव की राजनीति में निर्विरोध मुखिया बनकर उभरा था। बाद में वही व्यक्ति झारखंड के कोयलांचल और जंगलों में सक्रिय एक कुख्यात उग्रवादी संगठन तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (टीएसपीसी) का सुप्रीमो बन गया। पुलिस के अनुसार, ब्रजेश पहले भाकपा माओवादी से जुड़ा था, लेकिन बाद में वर्चस्व और मतभेदों के चलते वर्ष 2004-05 के आसपास उसने अलग संगठन खड़ा किया। यही संगठन आगे चलकर टीएसपीसी के रूप में मजबूत हुआ। चतरा, पलामू, लातेहार, हजारीबाग, रामगढ़ और आसपास के इलाकों में संगठन की गतिविधियां बढ़ीं। लेवी वसूल खड़ा किया नेटवर्क, चार अलग-अलग नामों से सक्रिय प्राप्त जानकारी के मुताबिक ब्रजेश पर बीड़ी पत्ता कारोबार से जुड़े ठेकेदारों से लेकर कोयला परियोजनाओं की आउटसोर्सिंग कंपनियों, ट्रांसपोर्टरों और कारोबारियों से लेवी वसूली का नेटवर्क खड़ा करने के आरोप लगे। ब्रजेश के कई नाम थे – बृजेश जी, दुलारचंद, सरदार, रंजन जी और गोपाल सिंह भोक्ता। वर्ष 2010 में वह लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया भी चुना गया था। यानी एक तरफ वह गांव की सरकार का प्रतिनिधि था, तो दूसरी ओर पुलिस रिकॉर्ड में उग्रवादी संगठन की कमान संभाल रहा था। पुलिस जवानों की हत्या सहित 39 से अधिक मामले चतरा एसपी अनिमेष नैथानी के अनुसार, ब्रजेश के खिलाफ जिले के सिमरिया, टंडवा, लावालौंग, सदर, मयूरहंड, पत्थलगड्डा, गिद्धौर और पिपरवार थानों में हत्या, अपहरण, लेवी वसूली, आर्म्स एक्ट और यूएपीए समेत 39 से अधिक मामले दर्ज थे। पुलिस के अनुसार, वर्ष 2012 में उसके दस्ते ने दो पुलिस जवानों की हत्या कर उनके हथियार लूट लिए थे। वहीं, 2019 में दर्ज एक लेवी मामले में एक गवाह की हत्या का आरोप भी ब्रजेश पर लगा। कोयला ढुलाई करने वाले वाहनों में आगजनी और कारोबारियों से लेवी वसूली के जरिए संगठन ने चतरा और आसपास के कोयला क्षेत्रों में अपना प्रभाव कायम किया। टीएसपीसी और भाकपा माओवादी के बीच भी लंबे समय तक वर्चस्व की लड़ाई चलती रही। इस संघर्ष में दोनों पक्षों के उग्रवादियों के साथ ग्रामीण और अन्य लोग भी प्रभावित हुए। 2014 में भाई गणेश गंझू बना विधायक ब्रजेश के उग्रवादी नेटवर्क के समानांतर उसके भाई गणेश गंझू का राजनीतिक सफर भी आगे बढ़ा। गणेश 2014 में झारखंड विकास मोर्चा के टिकट पर सिमरिया से विधायक निर्वाचित हुआ। बाद में भाजपा में शामिल हो गया। हालांकि, ब्रजेश की उग्रवादी गतिविधियों और परिवार की पृष्ठभूमि को लेकर राजनीतिक स्तर पर सवाल उठते रहे। 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने गणेश गंझू को टिकट नहीं दिया। दूसरी ओर, एनआईए की टेरर फंडिंग जांच में भी ब्रजेश का नाम सामने आया और वह एजेंसी की वांटेड सूची में शामिल रहा। अब टीएसपीसी के भविष्य पर सवाल ब्रजेश गंझू पर झारखंड सरकार ने 25 लाख रुपए और एनआईए ने पांच लाख रुपए यानी कुल 30 लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था। एनआईए की टेरर फंडिंग जांच के दौरान उसकी गतिविधियां सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर थीं। एनकाउंटर में मारे जाने के बाद उसके पास से दो पिस्टल, जिंदा कारतूस और खोखे बरामद किए जाने की बात एटीएस ने कही है। मुठभेड़ में एक साथी के फरार होने की भी जानकारी सामने आई है। ब्रजेश की मौत ऐसे समय हुई है, जब सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई से झारखंड में टीएसपीसी समेत कई उग्रवादी संगठनों की गतिविधियां पहले ही कमजोर पड़ चुकी हैं। करीब दो दशक तक माओवादी प्रभाव को चुनौती देते हुए चतरा और कोयलांचल में अपना नेटवर्क चलाने वाले टीएसपीसी के सबसे बड़े चेहरे के मारे जाने के बाद अब संगठन के बचे हुए ढांचे और नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
मुखिया से नक्सली सरगना बना ब्रजेश गंझू:माओवादी से अलग हो कर बनाया था TSPC, चार नामों से जाना जाता था, भाई था विधायक
