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झारखंड हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की प्रक्रिया के आधार पर किसी जमीन का मालिकाना हक तय नहीं किया जा सकता। म्यूटेशन, जमाबंदी और लगान रसीदें सिर्फ राजस्व रिकॉर्ड के लिए होती हैं। इनसे किसी व्यक्ति का कानूनी स्वामित्व साबित नहीं होता। अगर किसी जमीन पर दो पक्ष मालिकाना हक का दावा करते हैं, तो उसका फैसला सिविल कोर्ट ही कर सकती है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने हजारीबाग के दारू अंचल के मौजा काबिलासी की करीब 24.79 एकड़ जमीन से जुड़े पुराने विवाद की सुनवाई करते हुए किशोरी साह समेत आठ लोगों की अपील खारिज कर दी। -शेष पेज 13 पर अदालत ने एकलपीठ के फैसले को सही ठहराया सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि म्यूटेशन की प्रविष्टियां और लगान रसीदें केवल राजस्व अभिलेखों के रखरखाव के लिए होती हैं। इनका उद्देश्य स्वामित्व तय करना नहीं है। मालिकाना हक के विवाद में साक्ष्यों की विस्तृत जांच जरूरी है और यह काम सिविल कोर्ट ही कर सकता है। इसी आधार पर कोर्ट ने एकलपीठ के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
