Tuesday, May 26, 2026

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रोजगार के लिए जॉर्डन गया नौशाद, फॉरेन जेल में कैद:सुपौल में वार्ड पार्षद बोले- भारत के बेटे को वापस लाया जाए


सुपौल के राघोपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत नगर पंचायत सिमराही वार्ड संख्या-5 निवासी नौशाद अली अपने परिवार की आर्थिक तंगी दूर करने और बेहतर भविष्य की तलाश में जॉर्डन गया था। परिवार को उम्मीद थी कि विदेश में नौकरी मिलने के बाद घर की हालत सुधरेगी, कर्ज उतरेंगे और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बेहतर होगी। लेकिन कुछ ही महीनों में हालात ऐसे बदले कि पूरे परिवार की जिंदगी चिंता, बेबसी और इंतजार के बीच सिमटकर रह गई। नौशाद अली इन दिनों जॉर्डन की एक जेल में बंद है और परिवार को उसकी रिहाई की कोई स्पष्ट उम्मीद नजर नहीं आ रही है। परिजनों के अनुसार नौशाद अली 14 दिसंबर को अपने घर से जॉर्डन के लिए रवाना हुआ था और 18 दिसंबर को वहां पहुंचा। अगले दिन 19 दिसंबर को कंपनी में उसका इंटरव्यू हुआ। विदेश पहुंचने के बाद वह नियमित रूप से अपने परिवार से बातचीत करता था। परिवार को विश्वास था कि अब उनके संघर्ष के दिन धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगे और नौशाद की कमाई से घर की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। 6 मई तक होती रही बातचीत, फिर अचानक टूटा संपर्क नौशाद की पत्नी शबाना खातून बताती हैं कि 6 मई तक पति से उनकी नियमित बातचीत होती रही। लेकिन 7 मई को अचानक उनका फोन लगना बंद हो गया। पहले परिवार को लगा कि काम के दबाव या किसी तकनीकी कारण से संपर्क नहीं हो पा रहा होगा, लेकिन जब लगातार कई दिनों तक बात नहीं हुई तो चिंता बढ़ने लगी। पति की जानकारी लेने के लिए शबाना ने गांव के ही युवक इम्तियाज से संपर्क किया, जो जॉर्डन में ही रह रहा है। इम्तियाज ने बताया कि वह कंपनी जाकर जानकारी लेने की कोशिश करेगा। परिवार ने कंपनी में रह रहे अन्य लोगों से भी संपर्क किया, लेकिन किसी के पास नौशाद के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी। इस बीच परिवार की बेचैनी लगातार बढ़ती गई। हर दिन फोन आने की उम्मीद में बीत रहा था, लेकिन कोई खबर नहीं मिल रही थी। जॉर्डन की जेल से आया फोन करीब एक सप्ताह की चिंता के बाद 15 मई को अचानक नौशाद का फोन आया। यह फोन जॉर्डन की जेल से किया गया था। शबाना खातून बताती हैं कि पति की आवाज सुनकर उन्हें राहत मिली, लेकिन अगले ही पल जो बात उन्होंने सुनी उससे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। शबाना के अनुसार नौशाद ने फोन पर बताया कि वह जेल में है और उसे एक लड़की से जुड़े मामले में फंसा दिया गया है। उसने परिवार से मदद की गुहार लगाई। यह बातचीत कुछ ही देर की थी, लेकिन उसने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। परिजनों का कहना है कि 15 मई के बाद से नौशाद से उनकी कोई सीधी बातचीत नहीं हो सकी है। परिवार को अब तक मामले की पूरी जानकारी नहीं मिल पाई है और यही सबसे बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है। 5 लाख रुपये की मांग ने बढ़ाई मुश्किलें परिवार के अनुसार 19 मई को शबाना खातून के मोबाइल पर एक फोन आया। कॉल करने वाले ने नौशाद के बड़े भाई शमशाद का नंबर मांगा। इसके बाद शमशाद से संपर्क कर बताया गया कि नौशाद को कानूनी प्रक्रिया के जरिए छुड़ाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी और इस पर करीब 5 लाख रुपये तक खर्च आ सकता है। परिजनों का दावा है कि फोन पर यह भी कहा गया कि यदि समय पर कानूनी सहायता नहीं मिली तो सजा लंबी हो सकती है। इस जानकारी के बाद परिवार की चिंता और बढ़ गई है। हालांकि परिवार के पास इतनी बड़ी राशि की व्यवस्था करने का कोई साधन नहीं है। कर्ज लेकर भेजा था विदेश, अब घर चलाना भी मुश्किल नौशाद के विदेश जाने के पीछे परिवार की आर्थिक मजबूरी थी। पत्नी शबाना खातून बताती हैं कि जॉर्डन भेजने के लिए परिवार ने कई लोगों से उधार लिया था। करीब एक लाख रुपये गांव के दो लोगों से ब्याज पर लिए गए थे। इसके अलावा 55 हजार रुपये का लोन भी लिया गया था। परिवार को उम्मीद थी कि विदेश में नौकरी मिलने के बाद नौशाद धीरे-धीरे सभी कर्ज चुका देगा। लेकिन अब स्थिति यह है कि कर्ज का बोझ पहले से अधिक भारी हो गया है। घर में कोई स्थायी कमाने वाला नहीं है और रोजमर्रा का खर्च चलाना भी कठिन हो गया है। शबाना कहती हैं कि पति के जेल जाने के बाद पूरा परिवार असहाय महसूस कर रहा है। बच्चों की पढ़ाई, भोजन और अन्य जरूरतों की चिंता लगातार बनी हुई है। ऐसे में भविष्य को लेकर भी कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं देता। तीन मासूम बच्चों को नहीं पता पिता कहां हैं नौशाद और शबाना के तीन छोटे बच्चे हैं। सात वर्षीय मोहम्मद नासिक, पांच वर्षीय मोहम्मद दानिश और एक वर्षीय बेटी नूरे नाज अपने पिता की राह देख रहे हैं। बच्चे अक्सर अपनी मां से पूछते हैं कि उनके अब्बू कब घर आएंगे। शबाना बताती हैं कि बच्चों को पूरी सच्चाई बताना भी मुश्किल है। वे सिर्फ इतना जानते हैं कि उनके पिता विदेश में हैं, लेकिन यह नहीं समझ पाते कि आखिर इतने दिनों से उनकी बात क्यों नहीं हो रही है। माता-पिता की उम्मीदें भी टूटीं नौशाद के पिता मोहम्मद अलाउद्दीन और माता सेरा खातून बताते हैं कि नौशाद तीन भाइयों में सबसे छोटा है। दोनों बड़े बेटे दिल्ली में मजदूरी करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति लंबे समय से कमजोर रही है। माता-पिता का कहना है कि घर की जिम्मेदारियों और गरीबी को देखते हुए नौशाद ने विदेश जाने का निर्णय लिया था। उन्हें उम्मीद थी कि छोटा बेटा विदेश में मेहनत कर परिवार का सहारा बनेगा। लेकिन आज वही बेटा विदेशी जेल में बंद है और पूरा परिवार उसकी सलामती के लिए दुआ कर रहा है। वीजा बनवाने में गांव के युवक ने की थी मदद परिजनों ने बताया कि गांव के ही युवक इम्तियाज के माध्यम से नौशाद जॉर्डन गया था। वीजा और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की प्रक्रिया में उसी ने मदद की थी। फिलहाल परिवार उससे और अन्य परिचित लोगों से जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि जॉर्डन के कानून, भाषा और न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी नहीं होने के कारण परिवार खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रहा है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि नौशाद की मदद के लिए किससे संपर्क करें और आगे क्या कदम उठाएं। उम्मीद के सहारे गुजर रहे दिन जिस दिन नौशाद जॉर्डन गया था, उस दिन पूरे परिवार को बेहतर भविष्य की उम्मीद थी। लेकिन आज वही परिवार गहरे संकट में है। बूढ़े माता-पिता, परेशान पत्नी और तीन मासूम बच्चों की जिंदगी चिंता और इंतजार के बीच गुजर रही है। परिवार की एक ही मांग है कि नौशाद के मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि वह निर्दोष है तो उसे जल्द न्याय मिले। फिलहाल परिवार की निगाहें हर आने वाले फोन और हर नई सूचना पर टिकी हुई हैं, इस उम्मीद में कि एक दिन नौशाद सही-सलामत अपने घर लौट आएगा।

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