Wednesday, October 14, 2026
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संधि पूजा में 108 कमल क्यों चढ़ाते हैं? जानें इसका धार्मिक रहस्य

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दुर्गा पूजा में महाअष्टमी और महानवमी के मिलन काल यानी संधि पूजा का समय आते ही बाजारों में 108 कमल के फूलों को लेकर भारी मारामारी शुरू हो जाती है. बदलते मौसम, सिकुड़ते जलस्रोतों और अचानक बढ़ी भारी मांग के कारण आयोजकों को कई बार दूसरे राज्यों से हवाई मार्ग के जरिए इन्हें मंगाना पड़ता है.

दाम आसमान छूने के बावजूद श्रद्धालु किसी भी कीमत पर 108 कमल जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस अनुष्ठान में ठीक 108 कमल ही क्यों चढ़ाए जाते हैं.

प्रभु श्री राम की परीक्षा और एक गायब कमल का रहस्य

इस परंपरा की जड़ें त्रेतायुग में भगवान श्री राम के अकाल बोधन से गहराई से जुड़ी हुई हैं. लंका विजय से पहले प्रभु श्री राम ने मां दुर्गा की विशेष आराधना का संकल्प लिया था, जिसमें 108 दुर्लभ नीलकमल अर्पित करने अनिवार्य थे. अनुष्ठान के दौरान देवी ने श्री राम की निष्ठा और भक्ति की परीक्षा लेने के लिए पूजा की थाली से एक कमल गायब कर दिया.

संकल्प अधूरा रहने के संकट को देखते हुए श्री राम को स्मरण हुआ कि उनकी माता उन्हें ‘राजीवलोचन’ यानी कमल नयन कहती थीं. उन्होंने संकल्प पूरा करने के लिए बिना किसी संकोच के बाण से अपना एक नेत्र निकालकर देवी के चरणों में समर्पित करने का निर्णय लिया. उनकी इस अटूट निष्ठा और परम समर्पण से प्रसन्न होकर मां दुर्गा प्रकट हुईं और उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया. तभी से इस विशेष पूजा में ठीक 108 कमल अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है.

108 की संख्या और चामुंडा रूप

सनातन परंपरा में 108 की संख्या को ब्रह्मांडीय पूर्णता और संतुलन का प्रतीक माना गया है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार 12 राशियां और 9 नक्षत्र चरण मिलकर 108 का निर्माण करते हैं, जो संपूर्ण सृष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं. संधि काल के 48 मिनट वही समय होते हैं जब मां दुर्गा ने चंड और मुंड का संहार करने के लिए उग्र चामुंडा रूप धारण किया था. 108 कमल अर्पित करने का मुख्य उद्देश्य उस प्रचंड शक्ति को नमन करना और संपूर्ण ब्रह्मांड की ओर से आत्मसमर्पण व्यक्त करना है.

आज के समय में 108 ताजे कमल जुटाना भले ही आयोजकों के लिए हर साल एक बड़ी चुनौती बन जाता हो, लेकिन भक्तों की आस्था इसे संभव बनाती है. यह केवल फूलों की गिनती नहीं, बल्कि श्री राम जैसी अडिग भक्ति और समर्पण का जीवित प्रमाण है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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