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समान नागरिक संहिता के लिए बंगाल सरकार तैयार, जानें इसके सियासी समीकरण और कानूनी चुनौतियों के बारे में

समान नागरिक संहिता के लिए बंगाल सरकार तैयार, जानें इसके सियासी समीकरण और कानूनी चुनौतियों के बारे में

खास बातें

UCC in Bengal: पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी सरकार विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पेश करने के लिए पूरी तरह तैयार है. कानून के मसौदे की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में कमेटी गठन को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है.

कानून के दायरे से बाहर रहेंगे संरक्षित आदिवासी

यह विधेयक काफी हद तक असम के यूसीसी कानून के मॉडल पर आधारित होगा. इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य सभी समुदायों के बीच विवाह, तलाक और विरासत के संबंध में समान नागरिक नियम लागू करना है. हालांकि, संवैधानिक रूप से संरक्षित आदिवासी समूहों को स्पष्ट रूप से इस कानून के दायरे से बाहर रखा जायेगा.

बहु विवाह, बाल विवाह को खत्म करने का प्रयास

इस विधेयक के जरिये बहु विवाह और बाल विवाह जैसी प्रथाओं को समाप्त करने तथा विरासत के अधिकारों में समानता लाने का प्रयास किया जायेगा.

इसे भी पढ़ें : यूसीसी ड्राफ्ट की समीक्षा के लिए समिति गठन को बंगाल कैबिनेट की मंजूरी, 4 सप्ताह में आयेगी रिपोर्ट

बंगाल और समान नागरिक संहिता से जुड़े मुख्य तथ्य

  1. पश्चिम बंगाल भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी वाले राज्यों में एक है. राज्य की आबादी का लगभग 27 प्रतिशत मुस्लिम हैं.
  2. यूसीसी शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मुद्दों को नियंत्रित करने वाले धर्म-विशिष्ट व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) की जगह लेगा.
  3. भारतीय जनता पार्टी ने लंबे समय से समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने का समर्थन किया है.
  4. बीजेपी का तर्क है कि यह कानून के समक्ष समानता और लैंगिक न्याय (Gender Justice) को बढ़ावा देगा.
  5. पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे के जरिये बीजेपी को अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों से खुद को अलग करके अपनी मूल वैचारिक प्रतिबद्धताओं में से एक को मजबूत करने का मौका मिलता है.
  6. अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने देशव्यापी यूसीसी लागू करने का विरोध किया है.
  7. तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि व्यक्तिगत कानूनों और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए.

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UCC in Bengal: क्या है समान नागरिक संहिता?

समान नागरिक संहिता का अर्थ है- सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून होना, चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) में कहा गया है कि राज्य को पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने का प्रयास करना चाहिए. चूंकि, नीति निदेशक तत्व अदालतों द्वारा लागू करने योग्य नहीं होते हैं, इसलिए सरकारें इन्हें लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं. उत्तराखंड यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बना था, जिसके बाद गुजरात और असम ने इस दिशा में कदम बढ़ाया.

इसे भी पढ़ें : बंगाल विधानसभा में ‘समान नागरिक संहिता’ बिल ला रही शुभेंदु सरकार, ममता बनर्जी ने किया आर-पार की जंग का ऐलान

अदालत में कौन-सी कानूनी अड़चनों आ सकती हैं?

पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित यूसीसी विधेयक को अदालतों में कड़ी कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. इसके खिलाफ मुख्य रूप से 3 संवैधानिक तर्क दिये जा सकते हैं.

  1. धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन (अनुच्छेद 25): विरोध करने वालों का तर्क है कि विवाह, तलाक और विरासत जैसे व्यक्तिगत कानून धार्मिक पहचान से जुड़े हैं. ऐसे में राज्य द्वारा थोपा गया यूसीसी संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन माना जा सकता है, जो प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसके अनुरूप आचरण करने और धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है.
  2. सांस्कृतिक और अल्पसंख्यक अधिकारों का हनन (अनुच्छेद 29): संविधान का अनुच्छेद 29 नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाये रखने का अधिकार देता है. आलोचकों का कहना है कि एक समान कानून विविध सांस्कृतिक प्रथाओं को दबा सकता है. अदालतों को यह देखना होगा कि कहीं यह कोड इन समूहों को हाशिये पर तो नहीं धकेलता.
  3. विधायी क्षमता और संघवाद (Federalism): व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मामले संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) में आते हैं, जिसका अर्थ है कि राज्य विधानसभाएं और संसद दोनों इस पर कानून बना सकते हैं. यदि राज्यों के यूसीसी कानून केंद्रीय कानूनों के साथ टकराव पैदा करते हैं, तो यह एक जटिल क्षेत्राधिकार की लड़ाई का रूप ले सकता है.

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